लंबे वैवाहिक मुकदमे सिर्फ कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: उच्चतम न्यायालय

लंबे वैवाहिक मुकदमे सिर्फ कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: उच्चतम न्यायालय

लंबे वैवाहिक मुकदमे सिर्फ कागजों पर शादी बनाए रखते हैं: उच्चतम न्यायालय
Modified Date: June 3, 2026 / 04:15 pm IST
Published Date: June 3, 2026 4:15 pm IST

नयी दिल्ली, तीन जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 15 साल से अलग रह रहे जोड़े के बीच शादी समाप्त करते हुए कहा है कि वैवाहिक मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने से विवाह केवल कागजों पर ही कायम रहता है।

शीर्ष अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने कई बिंदुओं पर पति के पक्ष में तलाक को मंजूरी दी थी। तलाक मंजूर करने के उपयुक्त कारणों में से एक कारण यह भी था कि पत्नी ने कई मौकों पर यौन संबंध बनाने से इनकार किया था, जो उच्च न्यायालय की नजर में पति के प्रति क्रूरता थी।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, ‘‘भारत की अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यौन संबंधों से दूरी बनाए रखना गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, उच्च न्यायालय का निष्कर्ष बरकरार रखा जाता है। प्रतिवादी-पति की अपील को स्वीकार करते हुए दी गई तलाक की डिक्री (आदेश) को बरकरार रखा जाता है।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके कई फैसलों में यह माना गया है कि बिना किसी उचित कारण के लगातार यौन संबंधों से इनकार करने सहित विभिन्न दांपत्य अधिकारों से वंचित करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आई ए) के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है।

पीठ ने रेखांकित किया कि चिकित्सक दंपति की शादी दिसंबर 2007 में हुई थी। पत्नी गुजरात में और पति राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं।

शीर्ष अदालत ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इस जोड़े के बीच वैवाहिक बंधन को समाप्त किया जाना उचित है क्योंकि यह स्पष्ट था कि यह बंधन पूरी तरह से टूट चुका है और इसके अब पटरी पर आने की गुंजाइश बची नहीं है।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के पिछले साल फरवरी में दिये गये आदेश के खिलाफ पत्नी की अपील पर दो जून को अपना फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने पति की अपील मंजूर कर ली थी और तलाक की अनुमति दे दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में यह पाया कि दोनों पक्ष 15 से अधिक वर्षों से अलग रह रहे थे और उनसे कोई संतान नहीं थी। इतना ही नहीं, अदालतों द्वारा बार-बार किए गए प्रयासों के बावजूद, कोई सुलह नहीं हुई।

पीठ ने कहा कि विवाह, अपने कानूनी और संवैधानिक आयाम में, कभी भी व्यक्तिगत अधिकारों के मात्र एक संविदात्मक मिलन तक सीमित नहीं किया जा सकता है, और न ही इसे वैवाहिक अधिकारों की याचिका के संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।

न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक अधिकार एकतरफा अस्तित्व में नहीं होते हैं और वे वैवाहिक कर्तव्यों के संरचनात्मक प्रतिरूप हैं।

इसने कहा कि मानसिक क्रूरता के आरोपों का मूल्यांकन करते समय विवाह के बुनियादी पहलुओं से लगातार पीछे हटना कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है।

पीठ ने कहा कि इस मामले में पक्षों के आचरण से यह स्पष्ट था कि सहवास की छोटी अवधि के दौरान भी वे अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहे।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘यह अदालत इस दृष्टिकोण के प्रति सचेत है कि अदालतों का रुख विवाह की पवित्रता को बनाए रखने का होना चाहिए और किसी भी एक पक्ष के केवल कहने भर से तलाक देने में अदालत को संकोच करना चाहिए।’’

पीठ ने कहा कि इस मामले में, दंपति बहुत लंबे समय से अलग रह रहे थे और इस विवाह में कोई पवित्रता नहीं बची थी।

इसने कहा कि हालांकि पत्नी द्वारा यह दावा किया गया था कि उसने गुजरात में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और राजस्थान में रहने लगी थी, लेकिन इस दावों की पुष्टि करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं आया है।

पीठ ने कहा, ‘‘इसके विपरीत रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इस दलील के उलट हैं और इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि वह (पत्नी) अब भी गुजरात में अपनी नौकरी जारी रखे हुए है। उसकी ओर से पति के साथ रहने की कोई मंशा प्रतीत नहीं होती है, क्योंकि कथनी और करनी में फर्क है।’’

पीठ ने पत्नी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दंपति के विवाह को समाप्त कर दिया।

भाषा सुरेश पवनेश

पवनेश


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