मद्रास उच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश रद्द किया

मद्रास उच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश रद्द किया

मद्रास उच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश रद्द किया
Modified Date: July 27, 2026 / 10:34 pm IST
Published Date: July 27, 2026 10:34 pm IST

मदुरै, 27 जुलाई (भाषा) मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने सी. जोसेफ विजय नीत तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) सरकार के उस आदेश को सोमवार को रद्द कर दिया, जिसमें पिछले साल करूर में हुई भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का प्रावधान किया गया था।

अदालत ने टिप्पणी की कि इससे इस तरह की मांग की बाढ़ आ जाएगी।

न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे कई लोगों की ज़रूरतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

पीठ ने कहा कि ‘‘जब प्रतीक्षा सूची मौजूद हो, तो उनकी जरूरतों को नजरअंदाज करके करूर घटना के पीड़ितों के परिजनों के लिए ऐसी राहत देना उचित नहीं है।

अदालत ने कहा, ‘‘हमारा मानना ​​है कि ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत देश के नागरिक को मिली गारंटी का सीधा उल्लंघन हैं।’’

पीठ ने कहा कि सरकार की शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए।

इस बीच, आधिकारिक सूत्रों ने संकेत दिया कि राज्य सरकार उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख करने पर विचार कर रही है।

इसके अलावा, अदालत ने पटाखा निर्माण इकाइयों में हादसों और सड़क दुर्घटनाओं में जान जाने की घटनाओं का भी ज़िक्र किया। ऐसे मामलों में, पीड़ितों के परिजनों को अनुग्रह राशि दी जाती है, न कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी जाती है।

सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता विजय नारायण ने दलील दी कि ये नियुक्तियां प्रभावित परिवारों को आजीविका में मदद देने के लिए एक नीतिगत फैसला थीं। वहीं याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एक सरकारी आदेश लागू था, जिसके तहत मानवीय आधार पर नौकरी देने के लिए नियमों का पालन किया जाना ज़रूरी था।

पीठ ने यह भी कहा कि भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के आदेश से इसी तर्ज पर नौकरी की मांग करने वालों की बाढ़ आ जाएगी।

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 27 सितंबर 2025 में करूर में मची भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के 31 परिजनों को 10 जुलाई 2026 को नियुक्ति पत्र सौंपे थे।

टीवीके की एक रैली में मची भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो गई थी और 60 से अधिक लोग घायल हुए थे।

सरकार ने अपनी दलीलों में कहा कि ये नियुक्तियां संविधान के दायरे में और मानवीय आधार पर की गई थीं। सरकार ने पहले की गई नियुक्तियों का भी हवाला दिया, जिनमें तूतीकोरिन में स्टरलाइट-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पुलिस गोलीबारी में मारे गए लोगों के परिजनों को दी गई नौकरियां भी शामिल हैं।

राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने दलील दी कि ये नियुक्तियां केवल प्रभावित परिवारों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए की गई थीं।

वहीं, याचिकाकर्ताओं के वकील ने महाधिवक्ता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि तमिलनाडु में लगभग 39 लाख युवा बेरोजगार हैं और करीब 20 लाख उम्मीदवार प्रतियोगी भर्ती परीक्षाओं के लिए आवेदन करते हैं। उन्होंने कहा कि नियमित भर्ती प्रक्रिया से परे सरकारी नौकरियां देना अनुचित और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत था।

इस बीच करूर में, भगदड़ में शिकार हुए रवि कृष्णा की मां ज्ञानंबिका ने फैसले पर चिंता जताई और कहा कि अदालत को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और उन्हें नौकरी देने वाले सरकारी आदेश को मंज़ूरी देनी चाहिए।

पीड़ित परिवारों के सदस्यों को नौकरी देने के सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल करने वालों में से ‘नाम तमिलर काची’ के अधिवक्ता क्लेटस ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से कहा कि अदालत उन नियमों को स्पष्ट रूप से समझाया है जिनका पालन मानवीय आधार पर सरकारी नौकरी देते समय किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि मानवीय आधार पर नौकरी देने के मामले में यह एक नजीर फैसला होगा।’’

भाषा धीरज दिलीप

दिलीप


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