मोबाइल व कम शारीरिक गतिविधियों के चलते बच्चे ‘फैटी लिवर’ के चपेट में आ रहे हैं: विशेषज्ञ

मोबाइल व कम शारीरिक गतिविधियों के चलते बच्चे ‘फैटी लिवर’ के चपेट में आ रहे हैं: विशेषज्ञ

मोबाइल व कम शारीरिक गतिविधियों के चलते बच्चे ‘फैटी लिवर’ के चपेट में आ रहे हैं: विशेषज्ञ
Modified Date: April 6, 2026 / 04:35 pm IST
Published Date: April 6, 2026 4:35 pm IST

(अहमद नोमान)

नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा है कि शारीरिक गतिविधियों में कमी, मोबाइल फोन पर ज्यादा वक्त गुजारने और जंक फूड खाने से बच्चे ‘फैटी लिवर’ बीमारी की चपेट में आ रहे हैं।

उन्होंने इस बीमारी को ‘बदलती जीवनशैली’ का नतीजा बताते हुए माता-पिता से इस दिशा में विशेष ध्यान देने का आग्रह किया है।

विशेषज्ञों ने ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ पर इस चलन पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले यह बीमारी 40 साल पार कर चुके लोगों में देखने को मिलती थी लेकिन अब यह कम उम्र के युवाओं में भी दिख रही है।

सात अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है।

दिल्ली के अपोलो स्पेक्ट्रा अस्पताल में ‘इंटर्नल मेडिसिन’ के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अली शेर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि बच्चों में ‘फैटी लिवर’ का मुख्य कारण ‘जंक फूड’ का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों में कमी और मोबाइल फोन आदि इलैक्ट्रोनिक गैजेट पर ज्यादा वक्त बिताना है।

उन्होंने कहा कि पहले यह बीमारी 40-50 साल के लोगों में ज्यादा देखी जाती थी लेकिन अब 15-20 साल के युवा भी इसका शिकार होने लगे हैं।

डॉ शेर ने कुछ शोधों के हवाले से बताया कि करीब 35 फीसदी बच्चों में ‘फैटी लिवर’ के संकेत मिल सकते हैं जबकि मोटापे से ग्रस्त बच्चों में यह आंकड़ा 60 फीसदी तक पहुंचता है।

उन्होंने कहा कि स्कूल जाने वाले तकरीबन 10 से 15 साल के बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है जो ‘फैटी लिवर’ का बड़ा कारण है और इसलिए माता-पिता को बच्चों की जीवनशैली पर खास ध्यान देने की जरूरत है।

राष्ट्रीय राजधानी के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपटॉलॉजी (यकृत, पित्ताशय, पित्त नलिकाओं व अग्न्याशय) के निदेशक डॉ. जीएस लांबा ने एक सवाल के जवाब में बताया कि ‘फैटी लिवर’ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण बहुत हल्के या बिल्कुल नहीं होते।

उन्होंने कहा, “कुछ लोगों को थकान, पेट के दाईं ओर हल्का दर्द या भारीपन, भूख कम लगना जैसे संकेत मिल सकते हैं। कई बार यह बीमारी रक्त की नियमित जांच या अल्ट्रासाउंड में ही पकड़ में आती है। इसलिए अगर किसी को मोटापा, मधुमेह या कोलेस्ट्रॉल ज्यादा है, तो उसे नियमित जांच करवाते रहना जरूरी है।”

लांबा ने कहा कि समय पर पहचान हो जाए तो इस बीमारी का इलाज हो सकता है।

रीजेंसी अस्पताल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के डॉ. सचिन हच जे ने कहा कि यह बहुत बड़ा मिथक है कि ‘फैटी लिवर’ सिर्फ शराब पीने वालों को होता है क्योंकि देश में अधिकतर मामलों में “नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज” (एनएएफएलडी) के मामले देखे जा रहे हैं, जो शराब न पीने वालों में होते हैं।

उन्होंने कहा कि इसका मुख्य कारण मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध, मधुमेह और खराब खानपान है, इसलिए यह जरूरी है कि लोग अपनी जीवनशैली बदलें।

उनके मुताबिक, लोग ज्यादा कैलोरी वाला खाना, खासकर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट वाले पदार्थों का सेवन करते हैं और घंटों बैठकर काम करते हैं व शारीरिक गतिविधियां कम करते हैं। उन्होंने बताया कि इससे शरीर जो फैट जमा करता है वो धीरे-धीरे जिगर में जमा होने लगता है।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली का नतीजा है।

डॉक्टर शेर ने ‘फैटी लिवर’ से पीड़ित लोगों को इस बीमारी को नजरअंदाज न करने की सलाह देते हुए कहा कि ‘फैटी लिवर’ धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकता है, जिसमें जिगर में सूजन आना और इसके क्षतिग्रस्त होने का खतरा रहता है।

उन्होंने कहा, “आगे चलकर यह ‘फाइब्रोसिस’ व ‘सिरोसिस’ और यहां तक कि यकृत कैंसर का कारण बन सकता है। इसके अलावा यह दिल की बीमारी और मस्तिष्काघात का खतरा भी बढ़ाता है। इसलिए इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है और समय रहते इलाज बेहद जरूरी है।”

भाषा नोमान नोमान नरेश

नरेश


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