धन और प्रौद्योगिकी धनी देशों को वैश्विक पतन से नहीं बचा पाएंगे: अमिताभ घोष

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धन और प्रौद्योगिकी धनी देशों को वैश्विक पतन से नहीं बचा पाएंगे: अमिताभ घोष

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  • Publish Date - January 30, 2026 / 04:54 PM IST,
    Updated On - January 30, 2026 / 04:54 PM IST

नयी दिल्ली, 30 जनवरी (भाषा) प्रख्यात लेखक अमिताभ घोष ने इस राय पर सहमति जताई कि आगे गंभीर वैश्विक व्यवधान आ सकता है, लेकिन इस धारणा को खारिज कर दिया कि धन और प्रौद्योगिकी समृद्ध देशों की रक्षा करेंगे। उनका तर्क है कि ‘ग्लोबल साउथ’ के लचीलेपन को कम करके आंका गया है।

‘ग्लोबल साउथ’ का आशय दुनिया के कम संपन्न या विकासशील देशों से है।

बुधवार को ‘बीएमएल मुंजाल स्मृति व्याख्यान शृंखला’ के दूसरे संस्करण में “सर्वनाश के संकेत” विषय पर चर्चा करते हुए घोष ने तर्क दिया कि बड़े पैमाने पर पतन की आशंकाएं अतिरंजित नहीं हैं। उन्होंने इसके समर्थन में प्रमुख जलवायु वैज्ञानिकों की चेतावनियों का हवाला दिया।

उन्होंने ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (आईआईसी) में आयोजित व्याख्यान में कहा, ‘जब हैंस शेलनहुबर और विल स्टेफेन जैसे गंभीर और सतर्क जलवायु वैज्ञानिक ‘वर्तमान स्थिति के मद्देनजर पतन ही सबसे संभावित परिणाम है’ जैसी चेतावनी जारी करते हैं, तो भविष्य के बारे में आशंकित होने के कारण हैं।’

जलवायु और अन्य विषयों पर महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाने वाली ‘द ग्रेट डेरेंजमेंट’ और ‘द नटमेग्स कर्स’ के लेखक घोष ने कहा कि आधुनिक समाज आपूर्ति श्रृंखलाओं से लेकर औद्योगिक कृषि तक नाजुक, जटिल प्रणालियों पर निर्भर हैं, जो छोटे व्यवधानों से ध्वस्त हो सकती हैं।

उन्होंने तर्क दिया कि भू-राजनीतिक जोखिम और तेजी से अस्थिर हो रही दुनिया में परमाणु संघर्ष का बढ़ता खतरा हालात को और गंभीर बना रहा है।

घोष (69) ने कहा, ‘इसके अलावा, दुनिया इस समय अभूतपूर्व भू-राजनीतिक क्रांति से गुजर रही है, एक ऐसा घटनाक्रम जिसका यथास्थितिवादी शक्तियां, जिन्होंने पुरानी वैश्विक व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ उठाया है, निश्चित रूप से कड़ा विरोध करेंगी।’

उन्होंने यह भी कहा, ‘पश्चिम में यह धारणा बढ़ती जा रही है कि वैश्विक संकट के कारण पीड़ित और मरने वाले अधिकांश लोग ‘ग्लोबल साउथ’ में होंगे।’

घोष ने कहा कि धनी देशों का मानना ​​है कि वे ‘अपनी संपत्ति और प्रौद्योगिकी के कारण इसके प्रभावों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेंगे।’

इतिहास का हवाला देते हुए घोष ने कहा कि जिन आबादी को कभी विलुप्त मान लिया गया था, वे आज भी मौजूद हैं।

उन्होंने कहा, ‘विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने के बजाय, अफ्रीका में आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी है।’ उन्होंने कहा कि जिन समुदायों का कभी नरसंहार हुआ था, उन्होंने ‘पुनरुत्थान का दौर देखा है।’

अपने संबोधन के समापन में, घोष ने एक स्पष्ट विकल्प रखा, ‘आप किसके साथ रहना पसंद करेंगे-किसी ऐसे तकनीकी विशेषज्ञ के साथ जिसने अपना पूरा जीवन स्क्रीन के सामने बिताया हो, या किसी किसान या मछुआरे के साथ जो मिल-जुलकर रहना जानता हो?’

पद्मश्री से सम्मानित लेखक घोष का 11वां उपन्यास ‘घोस्ट-आई’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है, जो जलवायु संकट, पारिस्थितिक क्षरण जैसे विषयों पर केंद्रित है।

उनके अन्य चर्चित उपन्यासों में ‘द ग्लास पैलेस’, ‘गन आइलैंड’, ‘सी ऑफ पॉपीज’, ‘द हंग्री टाइड’ और ‘फ्लड ऑफ फायर’ शामिल हैं।

भाषा आशीष माधव

माधव