नासिक मामला: जबरन धर्मांतरण को ‘आतंकवादी कृत्य’ घोषित करने के लिये न्यायालय में याचिका
नासिक मामला: जबरन धर्मांतरण को ‘आतंकवादी कृत्य’ घोषित करने के लिये न्यायालय में याचिका
नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) नासिक स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) में धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर धोखाधड़ीपूर्ण धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिये निर्देश देने का अनुरोध किया गया।
यह याचिका नासिक स्थित टीसीएस कार्यालय में आठ महिला कर्मचारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन के आरोपों की पृष्ठभूमि में दायर की गई है।
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया कि धोखे से किया गया धर्मांतरण न केवल संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है, बल्कि बंधुत्व, गरिमा, एकता और राष्ट्रीय एकता के लिए भी खतरा है।
अधिवक्ता अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया, “नासिक में संगठित धर्मांतरण ने पूरे देश के नागरिकों की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। इसलिए, याचिकाकर्ता इस आवेदन को दायर कर रहा है जिसमें छलपूर्ण धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश और घोषणाओं का अनुरोध किया गया है।”
याचिका में यह तर्क दिया गया कि जबरन धर्मांतरण का अपराध, जब एक व्यवस्थित, संगठित और जबरदस्ती अभियान के हिस्से के रूप में किया जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 113 के तहत परिभाषित “आतंकवादी कृत्य” के दायरे में आता है।
इसमें कहा गया, “जबरन/धोखाधड़ी से किया गया धर्मांतरण कोई अलग-थलग धार्मिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित साजिश है जिसे अक्सर विदेशी संस्थाओं द्वारा वित्त पोषित किया जाता है ताकि जनसांख्यिकीय संतुलन को बदला जा सके और इस प्रकार भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को खतरे में डाला जा सके। इस कारणवश, यह गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 15 के तहत परिभाषित आतंकवादी कृत्य के दायरे में आता है।”
इसमें केंद्र और राज्यों को धर्मांतरण के मामलों से निपटने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने और यह घोषित करने के निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि धोखे से किए गए धर्मांतरण के लिए सजा एक साथ नहीं बल्कि क्रमिक होगी।
याचिका में कहा गया है कि धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार में धोखाधड़ी, बल प्रयोग, दबाव या छल के माध्यम से दूसरों को धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है।
भाषा प्रशांत अविनाश
अविनाश

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