न्यायाधीशों के नजरिये पर दिशानिर्देश बनाने के लिए समिति गठित करे राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी: न्यायालय
न्यायाधीशों के नजरिये पर दिशानिर्देश बनाने के लिए समिति गठित करे राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी: न्यायालय
नयी दिल्ली, 18 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक दृष्टिकोण में संवेदनशीलता विकसित करने की जरूरत का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि वह यौन अपराध के मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों के नजरिये को लेकर दिशानिर्देश तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे।
शीर्ष अदालत ने भोपाल स्थित अकादमी को ‘यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और करुणा विकसित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करना’ विषय पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने 10 फरवरी को पारित आदेश में कहा कि संवैधानिक अदालतों ने विभिन्न कदम उठाए हैं लेकिन अब तक के प्रयासों से कोई लाभ नहीं हुआ है।
पीठ ने मंगलवार को अपलोड किए गए आदेश में कहा, ‘‘…पूर्व में विभिन्न संवैधानिक और वैधानिक निकायों द्वारा किए गए इस प्रकार के प्रयासों, उन प्रयासों के जमीनी परिणामों और ऐसे ही संवेदनशील मामलों में पीड़ितों एवं शिकायतकर्ताओं को होने वाली समस्याओं के विभिन्न दायरे की व्यापक समझ के बिना किसी भी दिशानिर्देश को निर्धारित करने का नया प्रयास करने से हिचक रहे हैं।’’
उसने कहा, ‘‘इस तरह का प्रयास अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञों की बहुमूल्य राय और सुझावों के बिना भी नहीं किया जाना चाहिए…।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति न्यायिक या प्रशासनिक पक्ष के स्तर पर पहले किए गए उपायों पर विचार करेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘इस प्रकार के पूर्व प्रयासों और न्यायिक प्रणाली में विभिन्न हितधारकों के जमीनी अनुभवों की विविधता को ध्यान में रखते हुए व्यापक सिफारिशें तैयार करें।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि रिपोर्ट तैयार करते समय समिति देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति को यह याद रखना होगा कि इन दिशानिर्देशों के प्राथमिक लाभार्थी पीड़ित/शिकायतकर्ता हैं, जिनमें से अधिकतर बच्चे, कम उम्र की महिलाएं और समाज के संवेदनशील वर्गों के सदस्य हैं।
ये निर्देश स्वतः संज्ञान लेते हुए दायर की गई एक याचिका का निपटारा करते समय दिए गए। इस याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश का संज्ञान लिया गया था जिसमें उसने कहा था कि केवल निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना बलात्कार नहीं है।
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि वह उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है कि इस मामले में आरोप केवल तैयारी से संबंधित थे और वे बलात्कार के अपराध का प्रयास का नहीं थे।
भाषा सिम्मी मनीषा
मनीषा

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