नेपाल की बाढ़ ने योजनाबद्ध बसावट, वैज्ञानिक आकलन की जरूरत रेखांकित की: विशेषज्ञ

नेपाल की बाढ़ ने योजनाबद्ध बसावट, वैज्ञानिक आकलन की जरूरत रेखांकित की: विशेषज्ञ

नेपाल की बाढ़ ने योजनाबद्ध बसावट, वैज्ञानिक आकलन की जरूरत रेखांकित की: विशेषज्ञ
Modified Date: August 27, 2026 / 08:18 pm IST
Published Date: August 27, 2026 8:18 pm IST

नयी दिल्ली, 27 अगस्त (भाषा) विज्ञेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमनद झीलों के खतरों को समझने और उन्हें कम करने के लिए उनका व्यवस्थित वैज्ञानिक आकलन करने तथा हिमालयी क्षेत्र के लिए भूमि उपयोग नीति विकसित करने की जरूरत को रेखांकित किया है।

नेपाल में बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ में मरने वालों की संख्या बढ़कर 359 हो गई है।

काठमांडू के पास स्थित एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतराष्ट्रीय केंद्र (आईसीआईएमओडी) के शोधकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या ऊंचाई वाले किसी इलाके से चट्टानों के खिसकने या हिमस्खलन के कारण बाढ़ आई।

शोधकर्ताओं ने प्रभावित क्षेत्रों से मिले वीडियो फुटेज और जानकारी के शुरुआती आकलन के आधार पर कहा कि बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का मलबा भोटे कोशी नदी की सहायक नदी लेंडे खोला में गिरा होगा, जिससे अचानक तेज बहाव पैदा हुआ और पानी, तलछट तथा बड़े-बड़े पत्थर नीचे की ओर बहते चले गए।

आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ ‘क्रायोस्फीयर’ (हिममंडल) विशेषज्ञ और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फारूक आजम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘यह जलवायु परिवर्तन से जुड़ा मामला है क्योंकि बर्फ से ढका क्षेत्र कम हो रहा है, हिमनद सिकुड़ रहे हैं और चट्टानी या बंजर इलाके अधिक उजागर हो रहे हैं। ये इलाके अधिक गर्मी सोखते हैं, जिससे ढलान वाले इलाके अधिक अस्थिर हो जाते हैं।’’

उन्होंने कहा कि बाढ़ का सटीक कारण अभी पता नहीं लग पाया है लेकिन इसके पीछे बर्फ का कम होना, हिमनदों का सिकुड़ना और क्षेत्र में ‘परमाफ्रॉस्ट’ का कुछ हद तक पिघलना हो सकता है। ‘परमाफ्रॉस्ट’ पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित वह भूमि या मिट्टी की परत है जो लगातार दो या उससे अधिक वर्षों तक शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे कम तापमान पर पूरी तरह जमी रहती है।

‘ग्लोबल एंड प्लैनेटरी चेंज’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि हिमालय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं, विशेष रूप से भारी हिमपात, बर्फ के जमाव में केवल अस्थायी बढ़ोतरी करती हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल प्रदेश में हिमनद झीलों की संख्या बढ़ी है। ‘जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी: रीजनल स्टडीज’ में प्रकाशित हालिया अध्ययन के अनुसार, 1990 से 2024 के बीच इन झीलों की संख्या में 525 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इनका क्षेत्रफल दोगुना हो गया। छोटी झीलों की संख्या नौ से बढ़कर 487 हो गई।

अध्ययन के लेखक और पंजाब स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), रोपड़ के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख एवं एसोसिएट प्रोफेसर रीत कमल तिवारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हिमनद झीलें कई अलग-अलग प्रक्रियाओं से बन सकती हैं। ये हिमोढ़, हिमनद की बर्फ, चट्टानी गड्ढों या अन्य भू-आकृतिक संरचनाओं से अवरुद्ध होकर बन सकती हैं।’’

उन्होंने कहा कि हालांकि केवल किसी हिमनद झील की मौजूदगी का यह अर्थ नहीं है कि वह आसपास रहने वाले लोगों के लिए तत्काल खतरा है।

तिवारी ने कहा, ‘‘सबसे पहले हमें झील की संवेदनशीलता और स्थिरता का आकलन करना होगा तथा उन संभावित बाहरी कारणों की पहचान करनी होगी, जिनकी वजह से बड़ी मात्रा में अचानक पानी निकल सकता है। चिंता केवल हिमनद झीलों की बढ़ती संख्या नहीं है, बल्कि खतरे की बढ़ती आशंका और निचले इलाकों में बढ़ती आबादी तथा बुनियादी ढांचे का इसके संपर्क में आना है।’’

उन्होंने कहा कि भूस्खलन, भारी बारिश, हिमस्खलन, चट्टानों का गिरना अथवा लटकते हुए हिमनद का टूटना ऐसी घटनाओं को जन्म दे सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय में ‘पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च एसोसिएट’ सोनिया रिजाल ने कहा कि बारिश से अलावा अन्य कारणों को ध्यान में रखने वाली चेतावनी व्यवस्था का अभाव भी इस आपदा की एक वजह रहा।

नेपाल की यह बाढ़ फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में आई बाढ़ से मिलती-जुलती है, जब रोंटी चोटी से चट्टानों के खिसने और हिमस्खलन के कारण पानी का अचानक तेज बहाव आया था और ऋषिगंगा, धौलीगंगा एवं अलकनंदा नदियां प्रभावित हुई थीं। उस घटना में जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ था और करीब 300 लोग मारे गए या लापता हुए थे। इनमें ज्यादातर बांध स्थलों पर काम करने वाले श्रमिक थे।

आजम ने कहा, ‘‘हर आपदा अलग होती है। पहले हमें उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को समझना होगा और फिर उसी के अनुरूप उससे होने वाले नुकसान को कम करने के उपाय तैयार करने होंगे।’’

तिवारी ने कहा, ‘‘सबसे पहली जरूरत संभावित रूप से खतरनाक हिमनद झीलों और उनके निचले इलाकों का उचित वैज्ञानिक आकलन करने की है।’’

आजम ने कहा कि अचानक आई यह बाढ़ भूमि उपयोग नीति विकसित करने की तत्काल जरूरत को भी रेखांकित करती है।

उन्होंने कहा, ‘‘समस्या यह है कि हम नदी के बेहद करीब और कई बार तो नदी के क्षेत्र में ही बसावट कर रहे हैं। भूमि उपयोग नीति विकसित करने की तत्काल जरूरत है।’’

आजम ने कहा, ‘‘बस्तियों और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए उचित योजना होनी चाहिए, क्योंकि ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और हम जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों में इनकी आवृत्ति और तीव्रता, दोनों बढ़ी हैं।’’

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यह आकलन करने की जरूरत है कि पर्यावरण का बुनियादी ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

आजम ने कहा, ‘‘जब हम बुनियादी ढांचा विकसित करते हैं तो पर्यावरण पर प्रभाव आकलन करते हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि हम यह भी आकलन करें कि पर्यावरण का बुनियादी ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ेगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अगर भारी बारिश होती है, बादल फटता है, हिमनद झील फटने से बाढ़ आती है या कल जैसी कोई घटना होती है तो बस्तियों और बुनियादी ढांचे पर उसका क्या असर पड़ेगा? इस तरह का आकलन फिलहाल कहीं नहीं होता है।’’

भाषा सिम्मी माधव

माधव


लेखक के बारे में