एशिया की सबसे बड़ी अश्वनाल झील की बिगड़ती स्थिति को लेकर एनजीटी का केंद्र, अन्य को नोटिस

एशिया की सबसे बड़ी अश्वनाल झील की बिगड़ती स्थिति को लेकर एनजीटी का केंद्र, अन्य को नोटिस

एशिया की सबसे बड़ी अश्वनाल झील की बिगड़ती स्थिति को लेकर एनजीटी का केंद्र, अन्य को नोटिस
Modified Date: July 26, 2026 / 03:36 pm IST
Published Date: July 26, 2026 3:36 pm IST

नयी दिल्ली, 26 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बिहार स्थित एशिया की सबसे बड़ी अश्वनाल झील की बिगड़ती पारिस्थितिक स्थिति के मामले में केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

अश्वनाल झील नदी के चौड़े मोड़ के मुख्य धारा से कट जाने पर बनने वाला अश्वनाल आकार का एक जलाशय होता है।

एनजीटी उस मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने मीडिया में प्रकाशित एक खबर का स्वतः संज्ञान लिया था। खबर में बिहार के बेगूसराय से करीब 20 किलोमीटर उत्तर स्थित चेरिया बरियारपुर की कंवर झील की बिगड़ती पारिस्थितिक स्थिति का उल्लेख किया गया था।

हालिया आदेश में एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने कहा कि वर्ष 2020 में रामसर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त यह जलाशय एशिया की सबसे बड़ी अश्वनाल झील मानी जाती है और इसने ऐतिहासिक रूप से स्थानीय मछुआरा समुदायों की आजीविका का आधार प्रदान किया है।

मीडिया की खबर के अनुसार, जल क्षेत्र के सिकुड़ने और पारिस्थितिक क्षरण के कारण झील में मछलियों की संख्या और जैव विविधता में उल्लेखनीय गिरावट आई है तथा कई देशी मछली प्रजातियां कम हो गई हैं या आर्द्रभूमि के कुछ हिस्सों से लुप्त हो गई हैं।

पीठ ने कहा कि कभी लगभग 63 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह झील जलस्तर में गिरावट और अतिक्रमण के कारण धीरे-धीरे कई छोटे जलाशयों में बंटती चली गई है।

पीठ ने कहा कि कंवर झील का निर्माण बूढ़ी गंडक नदी के घुमावदार प्रवाह के कारण हुआ था और यह एक विशिष्ट अश्वनाल आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करती है।

अधिकरण ने कहा कि रामसर स्थल होने के कारण यह आर्द्रभूमि अंतरराष्ट्रीय महत्व रखती है और इसके पारिस्थितिक स्वरूप के संरक्षण तथा सतत प्रबंधन की आवश्यकता है।

पीठ ने कहा, ‘‘समाचार में विभिन्न सुधारात्मक उपायों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें झील को बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ना और संरक्षण संबंधी कदम शामिल हैं।’’

पीठ ने कहा, ‘‘झील की सीमाओं का निर्धारण और मानचित्रण किया जाना चाहिए तथा अतिक्रमण हटाया जाना चाहिए। इसके अलावा तटबंध या चेक डैम का निर्माण भी आवश्यक है। इस आर्द्रभूमि के अस्तित्व के लिए मानसूनी पुनर्भरण और भूजल का रिसाव जरूरी है।’’

अधिकरण ने कहा कि यह मामला पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम के प्रावधानों के दायरे में आता है।

पीठ ने कहा, ‘‘समाचार में पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं।’’

एनजीटी ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, बिहार सरकार को उसके मुख्य सचिव के माध्यम से, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित अन्य को मामले में प्रतिवादी बनाया है।

अधिकरण ने निर्देश दिया, ‘‘उपरोक्त सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए। वे 31 अगस्त को अगली सुनवाई से कम-से-कम एक सप्ताह पहले अधिकरण की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ (कोलकाता) के समक्ष शपथपत्र के माध्यम से अपना जवाब दाखिल करें।’’

भाषा अमित रंजन

रंजन


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