लोकसभा अध्यक्ष पर न्यायमूर्ति वर्मा की जांच के लिए समिति गठित करने में कोई रोक नहीं : न्यायालय

लोकसभा अध्यक्ष पर न्यायमूर्ति वर्मा की जांच के लिए समिति गठित करने में कोई रोक नहीं : न्यायालय

लोकसभा अध्यक्ष पर न्यायमूर्ति वर्मा की जांच के लिए समिति गठित करने में कोई रोक नहीं : न्यायालय
Modified Date: January 7, 2026 / 07:21 pm IST
Published Date: January 7, 2026 7:21 pm IST

नयी दिल्ली, सात जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि न्यायाधीश जांच अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित करने में कोई रोक नहीं है।

हाल में, इस तरह के एक प्रस्ताव लाने के संबंध में दिये गए नोटिस को राज्यसभा ने खारिज कर दिया था।

प्रथम दृष्टया राय व्यक्त करते हुए, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने न्यायमूर्ति वर्मा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की इस दलील से असहमति जताई कि राज्यसभा सभापति पद से जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद, उपसभापति को (न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए) प्रस्ताव लाने के लिए सौंपे गए नोटिस को खारिज करने का अधिकार नहीं है।

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हालांकि, शीर्ष अदालत ने अपनी मौखिक टिप्पणी में कहा कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति के गठन के तरीके में ‘‘कुछ खामियां’’ प्रतीत हो रही हैं। न्यायालय ने कहा कि वह इसकी पड़ताल करेगा कि क्या यह खामी कार्यवाही को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।

रोहतगी ने शुरूआत में, अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन का विरोध करते हुए कहा कि यदि न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव के नोटिस लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन एक साथ पेश किए जाते हैं, तो समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, ‘‘प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि हम रोहतगी के पहले और दूसरे बिंदु (जांच समिति का गठन और राज्यसभा के उपसभापति द्वारा प्रस्ताव के नोटिस को खारिज करने की कार्रवाई) से सहमत नहीं हैं… हमें केवल यह विचार करना है कि क्या हमें अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या उस व्यक्ति (न्यायमूर्ति वर्मा) को संयुक्त समिति (लोकसभा और राज्यसभा दोनों की) का लाभ मिलना चाहिए था…।”

पीठ न्यायमूर्ति वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत उनके आवास पर अधजले नोट बरामद होने के संबंध में उनके खिलाफ जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी।

रोहतगी ने अधिनियम की धारा 3(2) के एक प्रावधान का उल्लेख किया, जिसमें लिखा है, ‘‘बशर्ते कि जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव की सूचना संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन दी जाती है, तो कोई समिति उस वक्त तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि नोटिस दोनों सदनों में स्वीकृत न हो जाए और जहां ऐसा नोटिस दोनों सदनों में स्वीकार कर लिया गया हो, तो समिति का गठन (लोकसभा) अध्यक्ष और (राज्यसभा) सभापति द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा।’’

पीठ ने कहा कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह नहीं लिखा है कि यदि एक सदन नोटिस को अस्वीकार कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से वंचित हो जाता है।

न्यायमूर्ति दत्ता ने सवाल किया कि राज्यसभा द्वारा प्रस्ताव संबंधी नोटिस अस्वीकार किए जाने की स्थिति में लोकसभा द्वारा समिति गठित करने पर रोक कहां है?

उन्होंने पूछा कि यदि एक सदन ने प्रस्ताव संबंधी नोटिस को खारिज कर दिया है, तो लोकसभा द्वारा समिति के गठन पर रोक कहां है?

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि प्रावधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि राज्यसभा में प्रस्ताव संबंधी नोटिस की अस्वीकृति लोकसभा को उस पर आगे बढ़ने से रोकेगी या नहीं। उन्होंने कहा, ‘‘हमें प्रावधान में इसे उद्देश्यपूर्ण ढंग से समझना होगा।’’

हालांकि, पीठ ने कहा कि यदि राज्यसभा ने भी नोटिस स्वीकार कर लिया होता, तो न्यायमूर्ति वर्मा को संयुक्त समिति का लाभ मिल जाता।

पीठ ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या यह आपके हित के लिए इतना हानिकारक है कि हमें अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप करना पड़े?’’ इसके साथ ही पीठ ने याचिका पर आगे की सुनवाई बृहस्पतिवार के लिए तय कर दी।

रोहतगी ने राज्यसभा के उपसभापति द्वारा प्रस्ताव संबंधी नोटिस को खारिज करने के फैसले की भी आलोचना की, जिसे पहले उच्च सदन के सभापति ने स्वीकार कर लिया था।

रोहतगी ने कहा कि सवाल यह है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष एकतरफा तरीके से जांच समिति का गठन कर सकते हैं जबकि दोनों सदनों में, एक ही दिन पद से हटाने संबंधी प्रस्ताव के नोटिस पेश किए गए थे, लेकिन उन्हें केवल एक सदन में ही स्वीकार किया गया।

उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए संसद को अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए, जिसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस की आवश्यकता होती है।

ऐसा नोटिस स्वीकार हो जाने पर, विभागीय कार्यवाही के समान एक जांच करने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा, जिसके बाद सदन में चर्चा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यसभा के सभापति ने महज यह कहा था कि उन्हें एक नोटिस प्राप्त हुआ है, और इसे स्वीकार करने का कोई स्पष्ट आदेश पारित नहीं किया गया था।

न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च को नयी दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया था।

भाषा सुभाष रंजन

रंजन

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