संदेह जितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता : उत्तराखंड उच्च न्यायालय

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संदेह जितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता : उत्तराखंड उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - February 23, 2026 / 01:27 PM IST,
    Updated On - February 23, 2026 / 01:27 PM IST

देहरादून, 23 फरवरी (भाषा) आत्महत्या के एक मामले में सत्र अदालत द्वारा दी गयी सजा को रद्द करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता ।

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने यह टिप्पणी 2004 में खटीमा में हुए आत्महत्या के एक मामले में सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की ।

उच्च न्यायालय ने अपील पर सुनवाई के बाद अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक को भारतीय दंड सहिता की धारा 306 के तहत उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया ।

अपीलकर्ता की पत्नी ने 15 सितंबर 2004 को अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी । पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का कोई संकेत नहीं मिला । आरोप यह था कि पति को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था और उसने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिसके कारण उसने कथित तौर पर यह आत्मघाती कदम उठाया ।

उधमसिंह नगर की सत्र अदालत ने आरोपी को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोप से बरी कर दिया था लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए दोषी ठहराते हुए सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई और दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया था ।

फैसले के खिलाफ अपील दायर करते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे या उत्तेजना का कोई सबूत नहीं मिला और न ही कोई आत्महत्या नोट बरामद हुआ । उसने दलील दी कि केवल वैवाहिक कलह या चरित्र के बारे में संदेह को उकसावा नहीं माना जा सकता ।

भाषा सं दीप्ति मनीषा

मनीषा

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