मध्य दिल्ली में चार में से एक छात्र नींद की कमी का शिकार: अध्ययन

मध्य दिल्ली में चार में से एक छात्र नींद की कमी का शिकार: अध्ययन

मध्य दिल्ली में चार में से एक छात्र नींद की कमी का शिकार: अध्ययन
Modified Date: August 19, 2026 / 05:31 pm IST
Published Date: August 19, 2026 5:31 pm IST

(श्रुति भारद्वाज)

नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) मध्य दिल्ली के लगभग एक-चौथाई स्कूली छात्र पर्याप्त नींद न मिलने की समस्या से जूझ रहे हैं। खराब नींद का सीधा संबंध खराब शैक्षणिक प्रदर्शन और अवसाद के लक्षणों से पाया गया है। ‘इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में यह जानकारी सामने आई।

यह अध्ययन मई 2026 में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि अध्ययन में शामिल 1,452 किशोरों में से 326 (लगभग 22.5 प्रतिशत) नींद की कमी से पीड़ित थे। नींद की कमी से प्रभावित छात्रों की औसत शैक्षणिक योग्यता 64 प्रतिशत रही, जबकि पर्याप्त नींद लेने वाले उनके सहपाठियों की औसत शैक्षणिक योग्यता 67 प्रतिशत थी।

यह अध्ययन 12 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों पर किया गया, जिनकी औसत उम्र 14.18 वर्ष थी। इसमें मध्य दिल्ली के सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के छात्रों को शामिल किया गया था, जिनमें लड़कों और लड़कियों की समान भागीदारी थी।

यह शोध सर गंगा राम अस्पताल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आईसीएमआर-डॉ. ए एस पेंटल विशिष्ट वैज्ञानिक पीठ और सशस्त्र बल मेडिकल कॉलेज (एएफएमसी) के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

शोधकर्ताओं ने नींद की गुणवत्ता, अवसाद के लक्षण, ‘‘कॉग्निटिव फंक्शन’’ यानी सोचने, समझने और याद रखने की क्षमता और नींद से जुड़ी आदतों का मूल्यांकन करने के लिए मानकीकृत प्रश्नावली का उपयोग किया। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन, स्कूल में उनकी उपस्थिति, शरीर का वजन और लंबाई का अनुपात (बीएमआई), सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उनके पारिवारिक परिवेश का भी विश्लेषण किया।

नींद की कमी का आकलन ‘पिट्सबर्ग स्लीप क्वालिटी इंडेक्स’ के जरिए किया गया, जिसमें पांच से अधिक अंक नींद की खराब गुणवत्ता को दर्शाते हैं। इसमें आठ घंटे से कम की नींद को अपर्याप्त नींद माना गया।

अध्ययन में दिन के समय सुस्ती और ऊंघने की समस्या भी सामने आई। लगभग 48.3 प्रतिशत छात्रों ने माना कि उन्हें सप्ताह में कम से कम एक बार जागते रहने में कठिनाई होती है, जबकि छह प्रतिशत छात्र सप्ताह में तीन या उससे अधिक बार इस समस्या का सामना करते हैं।

अध्ययन में नींद की कमी और अवसाद के लक्षणों के बीच गहरा संबंध देखा गया। लगभग 60 प्रतिशत (912 किशोरों) में अवसाद के लक्षण पाए गए, जिनमें 32.9 प्रतिशत में हल्के और 27 प्रतिशत में मध्यम से गंभीर लक्षण थे।

अन्य कारकों को समायोजित करने के बाद अवसाद से पीड़ित किशोरों में नींद की कमी की संभावना सामान्य छात्रों की तुलना में 3.51 गुना अधिक पाई गई।

इसके अनुसार, ‘स्लीप हाइजीन’ यानी समय पर सोने, सोने से पहले मोबाइल-टीवी की स्क्रीन से दूर रहने और कमरे में सोने का सही माहौल बनाने जैसी आदतें बहुत मायने रखती हैं। जिन छात्रों की ‘‘स्लीप हाइजीन’’ बेहतर थी, उनमें नींद की कमी का खतरा काफी कम पाया गया।

‘कॉग्निटिव फंक्शन’ के मामले में लगभग 66 प्रतिशत (999 किशोरों) को खराब श्रेणी में रखा गया, हालांकि नींद की कमी और कॉग्निटिव स्कोर के बीच सीधा सांख्यिकीय संबंध नहीं मिला।

पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो 73.2 प्रतिशत छात्र संयुक्त परिवार से अलग एकल (न्यूक्लियर) परिवारों में रहते थे। एकल परिवारों में नींद की कमी की दर 21.2 प्रतिशत और संयुक्त परिवारों में 27.6 प्रतिशत देखी गई। इसके अलावा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति का नींद की कमी पर सीधा असर नहीं पड़ा, लेकिन इसका संबंध ‘‘कॉग्निटिव फंक्शन’’ से पाया गया।

शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि अनियमित दिनचर्या और देर तक स्क्रीन (मोबाइल/टीवी) देखने जैसे जीवनशैली के कारक नींद को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने स्कूलों में ‘‘स्लीप हाइजीन’’ और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जागरूकता कार्यक्रम चलाने और अभिभावकों तथा शिक्षकों को इसमें शामिल करने की सिफारिश की है।

भाषा सुमित मनीषा

मनीषा


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