पंतजलि विज्ञापन मामला : न्यायालय ने स्वीकार नहीं किए रामदेव, बालकृष्ण के हलफनामे

पंतजलि विज्ञापन मामला : न्यायालय ने स्वीकार नहीं किए रामदेव, बालकृष्ण के हलफनामे

पंतजलि विज्ञापन मामला : न्यायालय ने स्वीकार नहीं किए रामदेव, बालकृष्ण के हलफनामे
Modified Date: April 10, 2024 / 08:34 pm IST
Published Date: April 10, 2024 8:34 pm IST

नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने योग गुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के आचार्य बालकृष्ण के उन हलफनामों को स्वीकार करने से बुधवार को इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने ‘भ्रामक’ विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वह ‘इतनी उदार’ नहीं होना चाहती क्योंकि ‘‘उनकी (योग गुरु एवं बालकृष्ण की) गलती पकड़ी गई है और उन्होंने विपरीत परिस्थिति में फंसने के बाद हलफनामे दायर किये हैं।’’

न्यायालय ने इस मामले में निष्क्रियता बरतने के लिए उत्तराखंड के राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण के प्रति भी कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि वह इसे हल्के में नहीं लेगा, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि प्राधिकरण ने ‘‘जान-बूझकर’’ आंखें बंद कर रखी थी।

न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा, ‘‘हम आपकी बखिया उधेड़ देंगे।’’

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब रामदेव और बालकृष्ण को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किए गए और उन्हें अदालत के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया, तो उन्होंने उस स्थिति से ‘‘बचने का प्रयास किया’’ जहां व्यक्तिगत पेशी जरूरी थी।

न्यायालय ने कहा कि यह ‘‘बेहद अस्वीकार्य’’ है।

पीठ ने अदालत कक्ष में आदेश लिखाते हुए कहा, ‘‘मामले के पूरे इतिहास और अवमाननाकर्ताओं के पिछले आचरण को ध्यान में रखते हुए हम उनके द्वारा दायर नवीनतम हलफनामे को स्वीकार करने के अनुरोध पर अपनी आपत्ति व्यक्त करते हैं।’’

न्यायालय ने मामले में आगे की सुनवाई के लिए 16 अप्रैल की तारीख तय की।

शीर्ष अदालत ने प्राधिकरण के प्रति अप्रसन्नता जताते हुए कहा, ‘‘हम यह जानकर चकित हैं कि फाइलों को आगे बढ़ाने के अलावा राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने कुछ नहीं किया और वह चार-पांच साल से इस मुद्दे को लेकर ‘‘कुंभकर्णी नींद’’ में था।’’

न्यायालय ने प्राधिकरण की ओर से उपस्थित राज्य के अधिकारी से इस निष्क्रियता का कारण पूछा।

पीठ ने सुनवाई के दौरान प्राधिकरण के संयुक्त निदेशक से पूछताछ करते हुए कहा कि उन्हें कानून के अनुसार काम करना चाहिए था। पीठ ने कहा कि उनके पूर्ववर्ती अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान अपनी ओर से निष्क्रियता के बारे में एक हलफनामा दाखिल करेंगे।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि 2018 से अभी तक हरिद्वार में तैनात जिला आयुर्वेदिक और यूनानी अधिकारी भी अपनी ओर से हुई लापरवाही के लिए अपना हलफनामा दायर करेंगे।

पीठ ने रामदेव और बालकृष्ण की माफी को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘हम इस मामले में इतना उदार नहीं बनना चाहते।’’

उसने कहा, ‘‘हमें लगता है कि गलती पकड़े जाने पर और खुद को अप्रिय स्थिति में पाने पर’’ यह माफीनामा दिया गया।

पीठ ने रामदेव और बालकृष्ण की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी से कहा, ‘‘हम इसे स्वीकार करने या माफ करने से इनकार करते हैं। हम इसे आदेश का जानबूझकर किया गया उल्लंघन और वचनबद्धता का उल्लंघन मानते हैं…।’’

रामदेव और बालकृष्ण ने अपने औषधीय उत्पादों के असर के बारे में बड़े-बड़े दावे करने वाले विज्ञापनों को लेकर उच्चतम न्यायालय में ‘‘बिना शर्त माफी’’ मांगी थी।

उच्चतम न्यायालय में दाखिल दो अलग-अलग हलफनामों में रामदेव और बालकृष्ण ने शीर्ष अदालत के पिछले साल 21 नवंबर के आदेश में दर्ज ‘‘बयान के उल्लंघन’’ के लिए बिना शर्त माफी मांगी।

शीर्ष अदालत ने 21 नवंबर, 2023 के आदेश में कहा था कि पतंजलि आयुर्वेद का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने उसे आश्वासन दिया था कि ‘‘अब से खासकर पतंजलि आयुर्वेद द्वारा निर्मित और विपणन किए गए उत्पादों के विज्ञापन या ब्रांडिंग के संबंध में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं होगा। पतंजलि ने यह भी कहा था कि असर के संबंध में या चिकित्सा की किसी भी पद्धति के खिलाफ कोई भी बयान किसी भी रूप में मीडिया में जारी नहीं किया जाएगा।’’

शीर्ष अदालत ने कहा था कि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड ‘‘इस तरह के आश्वासन का पालन करने के लिए बाध्य है।’’

आश्वासन का पालन नहीं करने और उसके बाद मीडिया में बयान जारी किए जाने पर शीर्ष अदालत ने अप्रसन्नता व्यक्त की थी।

न्यायालय ने बाद में पतंजलि को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया कि क्यों न उसके खिलाफ अवमानना ​​कार्यवाही शुरू की जाए।

पीठ ने प्राधिकरण के वकील से पूछा, ‘‘आप औषधि और चमत्‍कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम, 1954′ के तहत निष्पादन प्राधिकारी हैं। आपने क्या किया? आपने किसका इंतजार किया? हम आपको बताएंगे।’’

इसमें कहा गया कि केंद्र ने 2020 में राज्य प्राधिकरण को आपत्तिजनक विज्ञापनों को रोकने के लिए स्पष्ट रूप से कहा था।

पीठ ने पूछा कि लाइसेंसिंग प्राधिकारण के अधिकारी और जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी को उनकी निष्क्रियता के लिए निलंबित क्यों नहीं किया जाना चाहिए।

जब प्राधिकरण के वकील ने अपने अधिकारियों की नेकनीयती का हवाला दिया, तो नाराज पीठ ने कहा, ‘नेकनीयती, आप कहते हैं? हम नेकनीयती को लेकर आपकी बखिया उधेड़ देंगे।’’

पीठ ने पूछा, ‘‘हमें यह क्यों नहीं सोचना चाहिए कि आप अवमाननाकर्ता प्रतिवादियों के साथ मिले हुए थे और आप जानबूझकर अपनी आंखें बंद रखे हुए थे?’’

सुनवाई के आख़िर में रोहतगी ने कहा कि वे सार्वजनिक माफ़ी मांगने के लिए तैयार हैं। आदेश सुनाने से पहले पीठ ने कहा, ”हम इससे निपटेंगे।”

शीर्ष अदालत भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) की एक याचिका पर सुनवाई कर रही है।

भाषा

सुरेश माधव

माधव


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