नाबालिग से यौन उत्पीड़न की जानकारी रखने वाले व्यक्ति को इसकी सूचना देनी होगी: न्यायालय
नाबालिग से यौन उत्पीड़न की जानकारी रखने वाले व्यक्ति को इसकी सूचना देनी होगी: न्यायालय
नयी दिल्ली, नौ जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि किसी नाबालिग से यौन उत्पीड़न के बारे में प्राप्त जानकारी को विश्वसनीय माना जायेगा और ऐसी जानकारी रखने वाला व्यक्ति पॉक्सो अधिनियम के तहत पुलिस समेत संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देने के लिए बाध्य होगा।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस सवाल की व्याख्या की कि किसी व्यक्ति को कब यह माना जा सकता है कि उसे यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत अपराध किये जाने की जानकारी है। पीठ ने कहा कि ‘‘ऐसे अपराध के किए जाने की जानकारी होना’’ केवल प्रत्यक्ष जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नाबालिग से सीधे प्राप्त सूचना के आधार पर अपराध के होने की जानकारी होना भी शामिल होगा।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘इसलिए, इस अधिनियम के उद्देश्य से, जब कोई बाल पीड़ित किसी व्यक्ति को यह बताता है कि उसके साथ इस अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध हुआ है या उसके साथ ऐसा अपराध होने की आशंका है, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जिस व्यक्ति को बाल पीड़ित ने यह जानकारी दी है, उसे इस बात की जानकारी है कि ऐसा अपराध किया गया है या किये जाने की आशंका है।’’
पीठ ने इस सवाल की व्याख्या अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल से जुड़े बच्चों को पॉक्सो अधिनियम के मामले के संदर्भ में की, जिसमें आठ वर्षीय एक बच्ची ने अपने शिक्षकों, बड़ी बहन और सहपाठियों को स्कूल के एक वरिष्ठ छात्र द्वारा कथित रूप से किए गए यौन उत्पीड़न के बारे में जानकारी दी थी।
पीठ ने कहा कि ऐसे मामले हो सकते हैं, जहां कोई बच्चा उस कृत्य की प्रकृति को समझे बिना भी उसके बारे में जानकारी दे सकता है, जिसका वह शिकार हुआ है।
इसने कहा, ‘‘ऐसे मामलों में और उन परिस्थितियों में भी जहां बच्चे द्वारा दी गई जानकारी स्पष्ट नहीं है या भ्रमित करने वाली है, बच्चे से पूछताछ करना उचित हो सकता है, ताकि उस जानकारी की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझा जा सके जिसे बच्चा बताना चाहता है। हालांकि, ऐसी पूछताछ का उद्देश्य बच्चे द्वारा की गई शिकायत को झूठा साबित करना या खारिज करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य शिकायत की वास्तविक और सही प्रकृति को समझना होना चाहिए।’’
उच्चतम न्यायालय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय और निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शिक्षकों और प्रधानाध्यापिका को पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराधों से मुक्त कर दिया गया था।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारे विचार में, पॉक्सो अधिनियम के घोषित उद्देश्य को पूरा करने के लिए, धारा 19 की उपधारा (1) में प्रयुक्त वाक्यांश “यह जानकारी होना कि ऐसा अपराध किया गया है” की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि इसमें अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध किए जाने के संबंध में प्राप्त विश्वसनीय जानकारी के आधार पर जागरूकता भी शामिल हो। और जहां ऐसी जानकारी सीधे पीड़ित से प्राप्त होती है, जो उसे बताने, रिपोर्ट करने या जानकारी देने में सक्षम है, तो उसे विश्वसनीय माना जायेगा।’’
मामले पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय और निचली अदालत यह मानने में गलती कर बैठे कि क्योंकि यौन उत्पीड़न के कोई स्पष्ट दिखाई देने वाले संकेत नहीं थे, इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं था कि ऐसा अपराध हुआ है; इसलिए आरोपी व्यक्तियों पर इसकी सूचना देने का कोई कानूनी दायित्व नहीं था।
इसने कहा, ‘‘हालांकि, संस्था के सभी शिक्षकों या पदाधिकारियों पर पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 के तहत दंडनीय अपराध के लिए मुकदमा चलाना आवश्यक नहीं है। केवल उन्हीं लोगों पर सूचना न देने के अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जिन्होंने पीड़िता से सीधे यह जानकारी प्राप्त की थी कि उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है।’’
पीठ ने कहा कि पीड़िता ने घटना के बारे में कुल चार लोगों को जानकारी दी थी, जिनमें उसकी बड़ी बहन, उसकी सहेली, स्कूल की छात्रा और एक शिक्षिका शामिल थीं।
उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली पीड़िता की मां की ओर से दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि संबंधित शिक्षिका के मामले में पुलिस रिपोर्ट में पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, जिससे पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 176 के तहत दंडनीय अपराध के आरोप तय करने के लिए उसके खिलाफ गंभीर संदेह उत्पन्न होता है। इसलिए, वह आरोपों से मुक्त किए जाने की हकदार नहीं है।
भाषा
देवेंद्र माधव
माधव

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