जंतर-मंतर प्रदर्शन में ‘फेशियल रिकग्निशन’ तकनीक के इस्तेमाल के खिलाफ न्यायालय में याचिका
जंतर-मंतर प्रदर्शन में ‘फेशियल रिकग्निशन’ तकनीक के इस्तेमाल के खिलाफ न्यायालय में याचिका
नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) राज्यसभा के एक सदस्य द्वारा उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें हाल में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा कथित रूप से ‘फेशियल रिकग्निशन’ (चेहरे की पहचान) तकनीक (एफआरटी) और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों के इस्तेमाल को चुनौती दी गई है।
केरल से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्यसभा सदस्य ए. ए. रहीम ने शीर्ष अदालत का रुख किया है और अनुरोध किया है कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभाओं में बिना किसी भेदभाव के बायोमेट्रिक निगरानी के इस्तेमाल को असंवैधानिक घोषित किया जाए तथा संसद द्वारा ऐसे उपायों को विशेष रूप से अधिकृत और नियंत्रित करने वाला कानून बनाए जाने तक इस पर रोक लगाई जाए।
‘फेशियल रिकग्निशन’ एक आधुनिक बायोमेट्रिक तकनीक है, जिससे चेहरे की पहचान कर किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि होती है।
अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के. आर. के माध्यम से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस ने बायोमेट्रिक निगरानी ऐसी स्थिति में की, जब उसे नियंत्रित करने के लिए कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा या नियम मौजूद नहीं है।
इसमें कहा गया कि न तो विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने वाले दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश और न ही आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022, जन सभाओं में भाग लेने वाले व्यक्तियों की बायोमेट्रिक निगरानी को अधिकृत करता है।
याचिका में दावा किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के चेहरे या अन्य जैविक पहचान संबंधी डाटा को स्वचालित प्रणाली के माध्यम से एकत्र किया और कथित तौर पर इस जानकारी को राष्ट्रीय आपराधिक रिकॉर्ड वाले स्थायी डेटाबेस से जोड़ दिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली पुलिस के आरटीआई जवाब से पता चलता है कि ‘फेशियल रिकग्निशन’ तकनीक को लागू करने से पहले लोगों की निजता पर इसके प्रभाव का कोई मूल्यांकन नहीं किया गया।
याचिका में अधिकारियों को ऐसे निर्देश दिये जाने का अनुरोध किया गया है, जिनके तहत बायोमेट्रिक निगरानी के लिए इस्तेमाल की गई तकनीकों का खुलासा करना आवश्यक हो।
भाषा देवेंद्र नरेश
नरेश

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