पुलिस अधिकारी संविधान की अपेक्षा सत्ताधारी दल के प्रति अधिक वफादार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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पुलिस अधिकारी संविधान की अपेक्षा सत्ताधारी दल के प्रति अधिक वफादार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - June 7, 2026 / 12:25 AM IST,
    Updated On - June 7, 2026 / 12:25 AM IST

प्रयागराज, छह जून (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारियों की निष्ठा संविधान की अपेक्षा सत्ता में रहने वाली सरकारों के प्रति अधिक दिखाई देती है।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि प्रदेश में राजनेताओं और नौकरशाहों की ‘‘सामंती मानसिकता’’ ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का माध्यम बना दिया है।

अदालत ने कहा, ‘‘राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था विभिन्न सरकारों के दौरान गहरे राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रति संवेदनशील रही है।’’

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के तबादले, नियुक्तियां और पदोन्नतियां योग्यता आधारित प्रशासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण के साधन बन गए हैं।

तीन जून को दिए गए अपने फैसले में पीठ ने कहा, ‘‘सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति निष्ठावान माने जाने वाले अधिकारियों को पसंदीदा पदस्थापनाएं(पोस्टिंग)-जैसे शहरी कमिश्नरेट और महत्वपूर्ण जिले प्राप्त होते हैं, जबकि स्वतंत्र रुख अपनाने वाले अधिकारियों को दंडात्मक रूप से महत्वहीन पदों पर भेज दिया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है।’’

अदालत ने कहा, ‘‘अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ व्यवस्था के प्रति होती है। तबादला-पदस्थापन की व्यवस्था से भली-भांति परिचित क्षेत्रीय अधिकारी अपने राजनीतिक वरिष्ठों को संतुष्ट करने के अनुरूप आचरण करते हैं। मुठभेड़ों में हुई मौतें, चुनिंदा कार्रवाई और असुविधाजनक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर अधिनियम का लक्षित उपयोग समय-समय पर न्यायिक संज्ञान में आता रहा है।’’

पुलिस व्यवस्था और कानून के शासन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा, ‘‘अधिकारी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा विधि के शासन को संवैधानिक दायित्व के बजाय प्रशासनिक असुविधा के रूप में देखता है। विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना गिरफ्तारियां की जाती हैं। कई बार प्राथमिकी दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं तथा निवारक निरोध के प्रावधानों का मनमाने ढंग से उपयोग किया जाता है।’’

उन्होंने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत उपलब्ध प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की अक्सर अनदेखी की जाती है तथा न्यायालय के आदेशों का औपचारिक पालन तो किया जाता है, लेकिन उनके वास्तविक उद्देश्य को निष्प्रभावी कर दिया जाता है।

न्यायमूर्ति दिवाकर ने ये टिप्पणियां गैंगस्टर एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 से संबंधित राजेंद्र त्यागी द्वारा दायर एक मामले की सुनवाई के दौरान कीं।

गैंगस्टर कानून के तहत आरोपित एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने राज्य में पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

भाषा

सं, राजेंद्र रवि कांत