पुलिसकर्मी ने बच्ची से दुष्कर्म मामले में परिवार को प्रभावित करने की कोशिश की: याचिका

पुलिसकर्मी ने बच्ची से दुष्कर्म मामले में परिवार को प्रभावित करने की कोशिश की: याचिका

पुलिसकर्मी ने बच्ची से दुष्कर्म मामले में परिवार को प्रभावित करने की कोशिश की: याचिका
Modified Date: March 23, 2026 / 08:03 pm IST
Published Date: March 23, 2026 8:03 pm IST

गुरुग्राम, 23 मार्च (भाषा)उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक याचिका में दावा किया गया है कि हरियाणा पुलिस की महिला उपनिरीक्षक ने गुरुग्राम में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले को परिवार से यह कहकर दबाने की कोशिश की कि पीड़िता को ‘गलतफहमी’ हुयी होगी।

याचिका के मुताबिक मामले की जांच की जिम्मेदारी निभा रही महिला पुलिस कर्मी ने परिवार से यहां तक कहा कि तीन आरोपियों में से एक शहर छोड़कर भाग जाएगा और फिर कभी नजर नहीं आएगा।

दस्तावेज के मुाबिक यौन उत्पीड़न के मामले को लापरवाही से संभालने की आरोपी महिला उप निरीक्षक को हरियाणा सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा ने 13 मार्च को एक अन्य यौन अपराध से संबंधित मामले को रफा-दफा करने के एवज में 25 हजार रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया।

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान महिला पुलिसकर्मी को फटकार लगाई। याचिका में आरोपी महिला पुलिस उपनिरीक्षक का नाम दर्ज है, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसकी पहचान उजागर नहीं की और उसे जांच अधिकारी और महिला उप निरीक्षक के रूप में संबोधित किया।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत,न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने माता-पिता को मामला आगे न बढ़ाने का सुझाव देने के लिए महिला अधिकारी की आलोचना करते हुए कहा, ‘‘यह चौंकाने वाला है… शिकायत दर्ज न होने पर भी पुलिस को मामले की जांच करनी होगी।’’

उच्चतम न्यायालय ने गुरुग्राम पुलिस के मामले से निपटने के तरीके पर भी सवाल उठाए। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने टिप्पणी की, ‘‘पुलिस किस हद तक असंवेदनशील हो गई है? तथाकथित महानगर में ऐसा हो रहा है! आप एक सदमे से ग्रस्त बच्ची का मामला संभाल रहे हैं।’’

शीर्ष अदालत ने गुरुग्राम में चार साल की बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराने का अनुरोध करने वाली बच्ची के परिवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार, पुलिस प्रमुख और अन्य को नोटिस जारी किया।

मामले में प्राथमिकी चार फरवरी को दर्ज की गई थी जबकि घटना उससे कुछ समय पहले घटी थी।

पीठ ने गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी (आईओ) को मामले के संपूर्ण रिकॉर्ड के साथ 25 मार्च को उसके समक्ष पेश होने का भी निर्देश दिया।

उच्चतम न्यायालय में जमा कराए गए दस्तावेजों के मुताबिक जांच अधिकारी ने पीड़िता की मां को यह कहते हुए कि बच्ची अंतत: घटना को भूल जाएगी, बार-बार प्राथमिकी दर्ज नहीं कराने के लिए मनाने की कोशिश की। महिला अधिकारी ने पीड़िता की मां से कथित तौर पर कहा कि अगर प्राथमिकी दर्ज होती है तो परिवार के लिए अगले तीन साल नरक समान होंगे।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह दृष्टिकोण एक गंभीर अपराध की वैध रूप से रिपोर्ट करने को हतोत्साहित करने का प्रयास प्रतीत होता है।

याचिका के मुताबिक पीड़िता के परिवार ने जांच अधिकारी को बार-बार बताया कि सीसीटीवी में रिकॉर्ड तस्वीरें और वीडियो से अहम सबूत मिल सकते हैं। इसके बावजूद, ऐसी फुटेज प्राप्त करने या उसका विश्लेषण करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस थाने में मुलाकात के दौरान जांच अधिकारी ने कहा कि बच्ची ‘गलतफहमी’ का शिकार हो सकती है।

याचिका के मुताबिक जांच अधिकारी ने पीड़िता द्वारा तीन बार पहचानी गयी एक आरोपी के बारे में कहा कि उसे पति के साथ शहर छोड़ने के लिए कहा जाएगा और वह अब शहर में कभी नजर नहीं आएगी।

न्यायालय के समक्ष दाखिल याचिका में कहा गया, ‘‘यह बेहद अनुचित है, क्योंकि यह कानूनी प्रक्रिया से बचने का प्रयास दर्शाता है। परिवार ने स्पष्ट रूप से इस बात पर जोर दिया था कि आरोपी को गिरफ्तार किया जाए ताकि किसी अन्य बच्चे को खतरा न हो।’’

महिला उप निरीक्षक को 13 मार्च को तत्काल प्रभाव से तब निलंबित किया गया था, जब उसे एक संविदा कर्मी के साथ दूसरे यौन उत्पीड़न मामले में गिरफ्तार किया गया था। महिला उपनिरीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है।

भाषा धीरज नरेश

नरेश


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