हैदराबाद, दो अप्रैल (भाषा) तेलंगाना सरकार के विरासत विभाग की एक टीम ने एक महत्वपूर्ण खोज में मुलुगु जिले में पाषाणकालीन कब्रों के एक संकुल का पता लगाया है।
इसे भारत में डोल्मेन (बड़े-बड़े पत्थरों से बने प्राचीन कब्र) पद्धति से बनाई गई कब्रों के सबसे बड़े समूहों में से एक माना जा रहा है।
मुलुगु जिले के मोतलागुडेम गांव के निवासियों द्वारा दी गई जानकारी और विशेष मुख्य सचिव जयेश रंजन के निर्देशों के आधार पर, एक तकनीकी टीम ने गांव का दौरा किया।
यहां बृहस्पतिवार को जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, हैदराबाद से 230 किलोमीटर दूर स्थित प्रागैतिहासिक कब्रें मुलुगु जिले के मोटलागुडेम गांव और उसके आसपास के इलाकों में पाई गईं।
इन्हें स्थानीय रूप से ‘राकासी बंदलु’ (विशाल पत्थर) और ‘राकासी गुहालु’ (विशाल गुफाएं) कहा जाता है।
विज्ञप्ति के मुताबिक, हाल ही में पहचाने गए ये स्थल (गोदावरी नदी बेसिन में) न केवल इस क्षेत्र में प्रारंभिक मनुष्यों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं, बल्कि उनकी जीवनशैली, रीति-रिवाजों, व्यवसायों और सामाजिक संरचनाओं को दर्शाने वाले मूल्यवान ऐतिहासिक साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं।
बयान में कहा गया कि जिले के एतुरनागरम अधिसूचित क्षेत्र में दमरावई, रंगपुरम और मंगापेट मंडल के मल्लूर गुट्टा, मोटलागुडेम, चेट्टुपल्ली तथा गुंडाला जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जहां ऐसे सैकड़ों कब्रों की पहचान की गई है।
कप्पलाई गुट्टा में पाई गईं कब्रें प्राचीन मनुष्यों के उल्लेखनीय कौशल और शिल्पकला को प्रदर्शित करते हैं।
डोल्मेन कब्रें खुरदुरे ढंग से तराशे गए बलुआ पत्थर की शिलाओं से निर्मित की जाती थीं, जो चार से 25 मीटर तक के क्षेत्रों में फैली होती हैं। प्रत्येक संरचना में चार बड़ी खड़ी पत्थर की शिलाएं होती हैं, जिनके ऊपर एक विशाल शीर्षशिला रखी होती है।
विज्ञप्ति के मुताबिक, प्रत्येक कब्र के अंदर, एक छोटा पत्थर ताबूत सरीखा होता है। इसके अतिरिक्त, एक कोने में खाली जगह छोड़ी जाती थी, और पूरी संरचना लगभग 10 फुट त्रिज्या वाली एक गोलाकार पत्थर की चारदीवारी से घिरी हुई होती है।
अलग-अलग कब्रों के बीच की दूरी पांच से 100 फुट तक है। यह बनावट एक सुनियोजित बसावट का संकेत देती है, जो एक संगठित प्राचीन शहर जैसी प्रतीत होती है। इन कब्रों में इस्तेमाल किए गए विशाल पत्थरों का वजन लगभग 10 से 20 टन है।
तकनीकी टीम के हवाले से विज्ञप्ति में बताया गया कि कप्पलाई गुट्टा क्षेत्र में लगभग 100 एकड़ में फैला यह ‘डोल्मेन’ कब्रगाह भारत में इस पद्धति से तैयार महापाषाणिक कब्रों का सबसे बड़ा समूह हो सकता है।
विज्ञप्ति के मुताबिक, इनमें से कुछ कब्रें जर्जर हो गई हैं, जबकि अन्य स्थानीय लोगों द्वारा घर बनाने के लिए पत्थर की शिलाओं के उपयोग के कारण क्षतिग्रस्त हो गई हैं। कब्रों के भीतर पाए गए पत्थर के ताबूत को पशुओं के लिए पानी के पात्र के रूप में उपयोग करने के लिए निकाल लिया गया है।
माना जाता है कि ये संरचनाएं, मिस्र के पिरामिड की तरह उस समय के लोगों की मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म में दृढ़ विश्वास को दर्शाती हैं।
विज्ञप्ति के मुताबिक, इसी तरह की दफनाने की परंपराएं दक्षिण भारत में व्यापक रूप से पाई जाती हैं, जिनमें तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना शामिल हैं। स्थानीय भाषा में इन संरचनाओं को ‘पांडव गुल्लू’ या ‘पांडवुला बंदा’ कहा जाता है।
भाषा धीरज सुरेश
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