सवाल पूछने पर छात्रों को सजा देना असंवैधानिक : न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूइयां

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सवाल पूछने पर छात्रों को सजा देना असंवैधानिक : न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूइयां

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  • Publish Date - August 30, 2026 / 06:09 PM IST,
    Updated On - August 30, 2026 / 06:09 PM IST

नयी दिल्ली, 30 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को कहा कि अलग राय जाहिर करने या सवाल पूछने वाले छात्रों को सजा की धमकी नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा रवैया असंवैधानिक और सत्ता का दुरुपयोग है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालय को ऐसी जगह होना चाहिए, जहां “स्थापित विचारों” की “जांच की जा सके और उन पर सवाल उठाए जा सकें” तथा असहमति को दुश्मनी की नजर से न देखा जाए।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को ऐसी जगह होना चाहिए, जहां स्वतंत्र रूप से सोचने की आदत विकसित हो और छात्र मुश्किल सवाल पूछने से न हिचकिचाएं।

न्यायामूर्ति भुइयां ने कहा कि सवाल पूछने का अधिकार बगावत या अवज्ञा का कृत्य नहीं है और “असहिष्णु मानसिकता” भारतीय संविधान की भावना के विपरीत है।

उन्होंने कहा, “जब छात्र अलग राय जाहिर करते हैं या सवाल पूछते हैं, तो उन्हें सजा देने की धमकी नहीं दी जा सकती। यह असंवैधानिक है। यह सत्ता और पद का दुरुपयोग है।”

न्यायमूर्ति भुइयां नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर छात्रों के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह है, जहां लोगों का सामना ऐसे विचारों से होता है, जो शायद उनके अपने विचारों से अलग हों; जहां स्थापित मान्यताओं की जांच की जाती है और उन पर सवाल उठाए जा सकते हैं; और जहां असहमति का जवाब दुश्मनी के बजाय तर्क से दिया जा सकता है। अगर हम एक ऐसा लोकतांत्रिक समाज चाहते हैं, जो आजादी और अलग-अलग विचारों का सम्मान करे, तो इस संस्कृति की शुरुआत विश्वविद्यालय से ही होनी चाहिए।”

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान मानता है कि एक स्वतंत्र समाज में अलग-अलग राय और मान्यताएं होंगी तथा सार्वजनिक जीवन में भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब असहमति के लिए भी जगह हो।

उन्होंने कहा कि सहनशीलता एक “संवैधानिक मूल्य” है और बुद्ध व गांधी की धरती होने के नाते भारत में “असहिष्णु मानसकिता” के लिए कोई जगह नहीं है, जो कि हिंसा का ही एक रूप है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “हमारा संविधान बोलने, सोचने और अलग तरह से विश्वास करने की आजादी की रक्षा करता है। असहिष्णुता उस ढांचे को तब कमजोर करने लगती है, जब असहमति या विरोध को राय का जायज फर्क नहीं, बल्कि ऐसी चीज माना जाने लगता है, जिसे दबाना, खारिज करना या जिसके लिए सजा देना जरूरी हो। इसलिए असहमति के साथ रहने की क्षमता सिर्फ एक सामाजिक गुण नहीं है। यह एक उदार संवैधानिक लोकतंत्र का मूल आधार है।”

उन्होंने कहा, “लोकतंत्र तब सार्थक नहीं होता, जब हर कोई एक ही तरह की सोच रखता हो, बल्कि तब होता है, जब अलग-अलग विचार साथ-साथ रह सकें, सुने जा सकें और उनके साथ सम्मान से पेश आया जाए।”

भाषा पारुल रंजन

रंजन