जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्वास्थ्य को रखने से व्यावहारिक कदम उठाना आसान: सौम्या स्वामीनाथन

जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्वास्थ्य को रखने से व्यावहारिक कदम उठाना आसान: सौम्या स्वामीनाथन

जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्वास्थ्य को रखने से व्यावहारिक कदम उठाना आसान: सौम्या स्वामीनाथन
Modified Date: July 1, 2026 / 10:52 am IST
Published Date: July 1, 2026 10:52 am IST

(अपर्णा बोस)

नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था में शीर्ष पद पर रह चुकीं सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्वास्थ्य को रखने से लोगों, सरकारों एवं स्थानीय निकायों के लिए व्यावहारिक कदम उठाना आसान हो जाता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की क्षति और प्रदूषण से मानव एवं पारिस्थितिकी स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचता है तथा मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा होता है।

संयुक्त राष्ट्र की एशिया-प्रशांत समन्वय रिपोर्ट की सह-लेखिका स्वामीनाथन ने ‘पीटीआई वीडियो’ से इस बारे में कहा कि भीषण गर्मी, जलजनित और मच्छर जनित बीमारियां, विस्थापन, लैंगिक हिंसा में वृद्धि तथा पोषण पर पड़ने वाला असर सबसे पहले स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में देशों को सुझाए गए कदमों के केंद्र में स्वास्थ्य को रखा गया है।

संयुक्त राष्ट्र के एशिया और प्रशांत के लिए आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (ईएससीएपी) ने मंगलवार को यह रिपोर्ट जारी की। इसमें इस बात का अध्ययन किया गया है कि भारत और चीन जैसे देश स्वास्थ्य केंद्रित उपायों के जरिये जलवायु, जैव विविधता और सतत विकास संबंधी लक्ष्यों को एक साथ कैसे आगे बढ़ा रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने कहा, ‘‘यदि भीषण गर्मी का उदाहरण लें तो हम इसे केवल भारत या विकासशील देशों में ही नहीं, बल्कि उच्च आय वाले देशों समेत पूरी दुनिया में देख रहे हैं और इससे कौन पीड़ित हो रहा है? फिर से वही लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं जो सबसे कमजोर हैं… वे लोग जिनकी आजीविका और आमदनी पहले से ही बहुत अस्थिर है।’’

उन्होंने गर्मी के आर्थिक असर को रेखांकित करते हुए कहा कि विश्व बैंक जैसी संस्थाओं का अनुमान है कि केवल गर्मी के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को खरबों डॉलर का नुकसान होता है और वायु प्रदूषण भी जीडीपी के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा, ‘‘स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर शुरुआत से ही विचार किया जाना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उनकी निगरानी की जाए और उन्हें दर्ज किया जाए क्योंकि ऐसा करने से उन लाभों का पता चलता है जो शीतलन प्रणाली या ऊर्जा दक्षता में किए गए शुरुआती निवेश से कहीं अधिक होते हैं।’’

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को मापने और दर्ज करने में ही समन्वित लाभ छिपा है तथा इसका अंतिम परिणाम कुछ सीमित उद्देश्यों के आधार पर आंके गए निवेश से मिलने वाले अपेक्षित लाभ से कहीं अधिक होता है।

यह पूछे जाने पर कि स्वास्थ्य केंद्रित जलवायु पहलों की जमीनी सफलता को कैसे मापा जा सकता है, स्वामीनाथन ने कहा कि इसके लिए शहरों के स्तर पर ऐसा एकीकृत ‘डैशबोर्ड’ बनाया जाना चाहिए, जिनमें वायु और जल की गुणवत्ता जैसे पर्यावरण संबंधी आंकड़ों को स्थानीय क्लीनिक तथा अस्पतालों के स्वास्थ्य आंकड़ों के साथ जोड़ा जाए।

उन्होंने कहा कि ऐसे ‘डैशबोर्ड’ भीषण गर्मी वाले इलाकों में अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में अचानक वृद्धि या बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में बीमारी फैलने जैसे रुझानों का पता लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे नीति निर्माता उन क्षेत्रों में संसाधन लगा सकेंगे, जहां उनका सबसे अधिक असर होगा और यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि जलवायु कार्रवाई में सबसे कमजोर लोगों के साथ समानता का व्यवहार हो।

स्वामीनाथन ने कहा, ‘‘मैंने दुनिया के कुछ शहरों और देशों को ऐसा करते देखा है। इनमें न्यूजीलैंड और वेल्स शामिल हैं। उन्होंने मूल रूप से एक ऐसा ‘डैशबोर्ड’ बनाया है, जिस पर नीति निर्माता पर्यावरण, स्वास्थ्य और अन्य पहलुओं से जुड़े आंकड़े देख सकते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारी जलवायु कार्रवाई के केंद्र में समानता होनी चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि सबसे कमजोर लोग, खराब आवास में रहने वाले, अस्थिर आजीविका वाले और दिहाड़ी मजदूर इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।’’

स्वामीनाथन ने कहा, ‘‘स्थानीय शहरी निकायों को सशक्त बनाया जाना चाहिए और उन्हें काम करने के लिए अधिक धन, उपकरण तथा जानकारी दी जानी चाहिए। नागरिकों की भागीदारी भी बढ़नी चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि भारत ऊर्जा दक्षता में भारी निवेश कर रहा है, लेकिन इन प्रयासों को स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से अलग करके देखा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि दोनों को एक साथ जोड़ने से ऐसे उपायों के समन्वित लाभ हासिल किए जा सकते हैं।

स्वामीनाथन ने कहा कि हर जिले में अलग-अलग समस्याएं होती हैं और केवल राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर नीति बनाना एवं उसे लागू करना ‘‘पर्याप्त नहीं’’ है।

उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां स्थानीय निकायों और पंचायतों को अधिकार दिए गए हैं तथा सामुदायिक भागीदारी के कारण कई कार्यक्रम अधिक सफल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जलवायु कार्रवाई के लिए समन्वित वित्तपोषण का एक तरीका यह है कि धन स्थानीय स्तर तक पहुंचाया जाए, जहां पंचायतें स्थानीय समस्याओं को हल करते हुए स्वाभाविक रूप से तालमेल बिठाती हैं।

स्वामीनाथन ने कहा कि इसके लिए स्थानीय निकायों को धन, क्षमता निर्माण में सहयोग और डिजिटल उपकरण देने की जरूरत है तथा इसके बाद निजी निवेश तथा नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ सकती है।

भाषा

सिम्मी वैभव

वैभव


लेखक के बारे में