राजस्थान उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी मामले में विक्रम भट्ट की जमानत याचिका खारिज की

राजस्थान उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी मामले में विक्रम भट्ट की जमानत याचिका खारिज की

राजस्थान उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी मामले में विक्रम भट्ट की जमानत याचिका खारिज की
Modified Date: January 5, 2026 / 10:28 pm IST
Published Date: January 5, 2026 10:28 pm IST

जोधपुर, पांच जनवरी (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी के एक मामले में फिल्मकार विक्रम भट्ट और उनके सहयोगियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने के अनुरोध वाली याचिका को सोमवार को खारिज कर दिया।

धोखाधड़ी मामले में भट्ट और उनकी पत्नी जेल में हैं।

न्यायमूर्ति समीर जैन ने हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह मामला केवल अनुबंध के उल्लंघन का नहीं लगता, बल्कि प्रथम दृष्टया इसमें जानबूझकर धन का गबन और दुरुपयोग शामिल है, और पुलिस जांच जारी रहेगी।

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उदयपुर निवासी अजय मुर्डिया ने विक्रम भट्ट, श्वेतांबरी भट्ट और अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात की शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक फिल्म परियोजना के नाम पर ली गई धनराशि का दुरुपयोग किया गया था।

भट्ट ने प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि मामला दीवानी प्रकृति का है, आपराधिक नहीं।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि विवाद मूल रूप से दो पक्षों के बीच अनुबंध के उल्लंघन का है, जो दीवानी प्रकृति का है, और उनके समझौते के तहत, विवादों को सुलझाने का अधिकार क्षेत्र मुंबई होना चाहिए था, न कि उदयपुर।

भट्ट को प्रतिष्ठित फिल्मकार बताते हुए, वकील ने अदालत में यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के साथ 40 करोड़ रुपये के निवेश से चार फिल्में बनाने का समझौता हुआ था, जिसके बाद सात करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश किया गया। वकील ने बताया कि चार फिल्मों में से एक पूरी हो चुकी है, लेकिन शिकायतकर्ता ने धन देना रोक दिया।

भट्ट और अन्य को कोई राहत देने से इनकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, ‘आरोप केवल अनुबंध के निष्पादन तक सीमित नहीं हैं; इनमें जानबूझकर धन का गबन, पारदर्शिता की कमी और बेईमानी के तत्व शामिल हैं। प्रारंभिक जांच में फर्जी बिल और धन के लेन-देन के सबूत मिले हैं।’

अदालत ने बंबई उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने का भी संज्ञान लिया और कहा कि जब किसी मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध सिद्ध होता है, तो उच्च न्यायालय को जांच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

भाषा आशीष दिलीप

दिलीप


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