लाल किला विस्फोट: घटना के छह महीने बाद भी पीड़ित परिवार मानसिक व शारीरिक आघात से उबरे नहीं

लाल किला विस्फोट: घटना के छह महीने बाद भी पीड़ित परिवार मानसिक व शारीरिक आघात से उबरे नहीं

लाल किला विस्फोट: घटना के छह महीने बाद भी पीड़ित परिवार मानसिक व शारीरिक आघात से उबरे नहीं
Modified Date: May 12, 2026 / 10:03 pm IST
Published Date: May 12, 2026 10:03 pm IST

नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) दिल्ली में लाल किले के पास पिछले साल 10 नवंबर को हुए बम विस्फोट के पीड़ितों का दर्द घटना के छह महीने बाद भी कम नहीं हुआ है तथा वे अब भी मानसिक और शारीरिक आघात से उबर नहीं पाए हैं।

चांदनी चौक स्थित भागीरथ पैलेस में दवाइयों के व्यापार से जुड़े अमर कटारिया का इस विस्फोट में निधन हो गया था। घटना के बाद काफी दिनों तक उनका तीन साल का बेटा इस आस में घर के दरवाज़े की ओर देखता था कि उसके पिता आएंगे, मगर अब वह खामोश है और उसने घर के दरवाज़े पर होने वाली दस्तक पर बाहर आकर देखना तक बंद कर दिया है।

लाल किले के पास 10 नवंबर 2025 की शाम छह बजकर करीब 52 मिनट पर एक कार में हुए बम विस्फोट में 15 लोगों की जान गई थी और कई अन्य बुरी तरह से जख्मी हुए थे। विस्फोट के प्रभाव के कारण कई शवों की पहचान तक नहीं हो सकी थी।

इस विस्फोट के 10 मई को छह महीने होने पर पीड़ितों के परिवारों ने शोक जताया। इस घटना ने उनके जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

कटारिया परिवार के एक रिश्तेदार ने कहा कि दिन गुजरते रहते हैं और मौसम बदला रहता है, लेकिन उनका दुख कम नहीं होता है।

रिश्तेदार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘अमर की मृत्यु हुए छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन इस परिवार के लिए यह कभी न खत्म होने वाला दुख है। उनकी पत्नी अब भी घंटों अपने कमरे में उस स्थान के बगल में बैठी रहती हैं जहां कभी उनके पति बैठा करते थे।”

उन्होंने कहा कि कृति इस अवधि में मुश्किल से घर से बाहर निकली होंगी। लेकिन इस दुख का सबसे ज्यादा असर तीन के साल के मासूम पर पड़ा है जिसने अपना पिता खो दिया है।

रिश्तेदार ने कहा, ‘विस्फोट के बाद शुरुआती दिनों में, जब भी वह दरवाजे के पास किसी की आहट सुनता था, तो वह तुरंत उम्मीद भरी निगाहों से उस ओर देखता था क्योंकि उसे विश्वास था कि उसके पिता आखिरकार वापस आ गए हैं। लेकिन अब सबसे दर्दनाक बात यह है कि उसने पीछे मुड़कर देखना छोड़ दिया है।’

उन्होंने कहा, “जरा उस बच्चे की कल्पना कीजिए जिसने आखिरकार यह समझ लिया है कि उसके पिता कभी नहीं लौटेंगे। प्री स्कूल में भर्ती होने के बाद से, वह पूरी तरह से अंतर्मुखी हो गया है। वह अब ज़ोर से नहीं हंसता और न ही इधर-उधर दौड़ता है; वह अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलता भी नहीं है।’

रिश्तेदार ने बताया कि बच्चा अब चुपचाप घर लौटता है और अपनी मां के बगल में बैठ जाता है, उन्हें लगातार पकड़े रहता है, मानो उसे उन्हें भी खोने का डर हो।

अमर के माता-पिता के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘वे जीवित हैं, लेकिन वे उन लोगों की तरह जी रहे हैं जिनकी आत्मा उन्हें छोड़कर चली गई है।’

विस्फोट में अमर का शव इतनी बुरी तरह से झुलस गया था कि उसकी पहचान नहीं पा रही थी। शव की शिनाख्त उसपर बने एक टैटू के जरिए हुई।

इस बीच, विस्फोट में अपनी एक आंख गंवाने वाले 27 वर्षीय अंकुश शर्मा एक अलग लड़ाई लड़ रहे हैं।

विस्फोट वाले दिन, शाहदरा के रोहतास नगर निवासी शर्मा अपने पड़ोसी और दोस्त राहुल कौशिक के साथ गौरी शंकर मंदिर दर्शन करने गए थे। घटना में राहुल झुलस गए थे और उनके कान के पर्दे फट गए थे जबकि शर्मा ने अपनी एक आंख गंवा दी और उन्हें एक कान से सुनाई देना भी बंद हो गया है।

इनके पारिवारिक मित्र प्रदीप कुमार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि विस्फोट में उनकी जान तो बच गई, लेकिन उस दिन से उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई। छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन इन परिवारों के लिए दुख एक दिन के लिए भी कम नहीं हुआ है।

कुमार ने कहा कि उनका जीवन अब अस्पताल के चक्करों, दवाओं, ड्रेसिंग, जांच और निरंतर दर्द के इर्द-गिर्द घूमता है। इलाज पर लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं, फिर भी उनके ठीक होने और भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि राहुल के पिता सेवानिवृत्ति के करीब हैं, और परिवार लगातार इस बात को लेकर चिंतित रहता है कि वे आने वाले महीनों में इलाज का खर्च कैसे उठा पाएंगे।

उन्होंने कहा, ‘अंकुश की उम्र केवल 27 साल है। वह एक आभूषण की दुकान में काम करता था। उसके भविष्य को लेकर सपने थे जैसे उसके उम्र के किसी भी युवक के होते हैं। आज, वह खुद को आईने में देखने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उसके माता-पिता अपने बेटे दर्द को देखकर अवसाद में जा रहे हैं। राहुल भी अब तक उस सब को समझने की कोशिश कर रहा है जो उसके साथ हुआ।’

भाषा नोमान नोमान माधव

माधव


लेखक के बारे में