सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता: न्यायालय ने शबरिमला मामले में कहा
सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता: न्यायालय ने शबरिमला मामले में कहा
नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि संविधान निर्माताओं ने समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कानून बनाए थे और नौ-सदस्यीय संविधान पीठ इसे ’उलट’ नहीं सकती।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। यह पीठ धार्मिक स्वतंत्रता के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है, जिनमें दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित मुद्दे भी शामिल हैं।
संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रशांत बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
सुनवाई के 14वें दिन के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को हटाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा, ‘‘हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार है। यह पूजा पवित्र स्थलों पर ही की जाती है और यदि इसे खत्म किया जाता है यह उनके (हिंदू धर्म के अनुयायियों के) अधिकारों का उल्लंघन होगा।’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने उनकी दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “समाज सुधार के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।’’
मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि शबरिमला मंदिर के संदर्भ में महिलाओं को प्रवेश से रोकने का आधार उनके मासिक धर्म की उम्र है।
उन्होंने कहा, ‘‘मान लीजिए मैं 10 साल की लड़की हूं और अपने परिवार के साथ (शबरिमला मंदिर) जा रही हूं… मासिक धर्म को अक्सर एक वर्जना और कलंक के रूप में देखा जाता है।’’
इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, “यह एक वर्जना है यदि आप इसे उसी दृष्टि से देखते हैं। सवाल यह है कि आप इसे कैसे देखते हैं, एक ‘भक्त’ इसे कैसे देखता है… न कि एक गैर-भक्त कैसे देखता है।”
हंसारिया ने दलील दी कि यदि सरकार द्वारा कोई सामाजिक कल्याण कानून बनाया जाता है, तो उसे बरकरार रखा जाना चाहिए और उसे किसी धार्मिक प्रथा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
इसपर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘यदि इस देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से एक स्वर में यह मांग करते हैं कि इस मुद्दे पर सामाजिक सुधार की आवश्यकता है, तो संभवतः अदालत इसे सामाजिक सुधार के रूप में स्वीकार करेगी। लेकिन यदि यह लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ है, उनपर कुछ थोपा जाता है या उन्हें चुप कराने के नियम की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।’’
‘‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’’ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि तर्कवादी वे लोग हैं, जो धर्म सहित हर चीज को तर्क की कसौटी पर परखते हैं।
हेगड़े ने कहा कि संविधान स्वयं अनुच्छेद 51ए(एच) जैसे प्रावधानों के माध्यम से तर्कवादी मूल्यों को समाहित करता है, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधारवादी सोच विकसित करने का कर्तव्य निर्धारित करता है।
दिवंगत स्वामी अग्निवेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि संविधान ने विशेष रूप से हिंदू धर्म के भीतर धार्मिक सुधार की परिकल्पना सोच-समझकर की है।
मेनका ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि वे अपवर्जनात्मक धार्मिक प्रथाओं को पूर्ण संरक्षण प्रदान करें, खासकर तब जब ऐसी प्रथाएं समानता और गरिमा के अधिकार से मेल न खाती हों।
उन्होंने अनुच्छेद 26 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान में ‘कंट्रोल’ (नियंत्रण) के बजाय ‘मैनेज’ (प्रबंधन) शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘अनुच्छेद 26 में ‘कंट्रोल’ की जगह ‘मैनेज’ शब्द का उपयोग यह दर्शाता है कि संविधान का उद्देश्य संप्रदायों के अधिकारों और अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है।’’
मेनका ने कहा कि जैसा कि उच्चतम न्यायालय की छह-सदस्यीय पीठ ने माना था कि अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपने संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार भी सीमित है।
उनकी दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनकी कुछ विशिष्ट विशेषताएं हैं। इसी कारण अनुच्छेद 30 मौजूद है। पचास के दशक या चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में भारत कैसा था? हमें विरासत में क्या मिला था? समाज में क्या कमियां थीं?’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सवाल किया, ‘‘क्या आज हम नौ-सदस्यीय पीठ के रूप में इस सभ्यता की व्यवस्था को बदलने जा रहे हैं?’’
इस पर मेनका गुरुस्वामी ने जवाब दिया कि संविधान निर्माताओं को विश्वास था कि आस्था और धर्म में सुधार करके वे किसी सभ्यतागत संतुलन को बिगाड़ नहीं रहे थे।
मामले की अगली बुधवार को जारी रहेगी।
भाषा सुरेश माधव
माधव

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