बार-बार होने वाले मुकदमों के कारण सेवा संबंधी विवाद और बढ़े : न्यायालय
बार-बार होने वाले मुकदमों के कारण सेवा संबंधी विवाद और बढ़े : न्यायालय
नयी दिल्ली, 15 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि देशभर में लंबित सेवा संबंधी विवादों की बड़ी संख्या बार-बार होने वाले मुकदमेबाजी से और भी जटिल हो जाती है और न्यायपालिका को सेवा नियमों की व्याख्या इस तरह से करनी चाहिए जो चयन प्रक्रिया के मूल उद्देश्य की पूर्ति करे।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की कि आरक्षित सूची में शामिल उम्मीदवार सूची की वैधानिक वैधता समाप्त होने के बाद नियुक्ति के अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं।
पीठ ने कहा, “न्यायपालिका में अपने संयुक्त अनुभव के आधार पर, हम यह कह सकते हैं कि देशभर में लंबित सेवा-संबंधी विवादों की एक बड़ी संख्या लंबी और बार-बार होने वाली मुकदमेबाजी से और भी जटिल हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप देशभर में कई उम्मीदवारों के लिए निरंतर अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है।”
न्यायालय ने कहा, “न्यायपालिका को इन व्यावहारिक वास्तविकताओं के प्रति सतर्क रहना चाहिए और सेवा नियमों की व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए जिससे चयन प्रक्रिया का मूल उद्देश्य पूरा हो सके, अर्थात् उपयुक्त उम्मीदवारों में से सबसे उपयुक्त उम्मीदवारों का समय पर चयन करके नियुक्ति सुनिश्चित करना।”
राजस्थान उच्च न्यायालय के कई आदेशों को रद्द करते हुए, शीर्ष न्यायालय ने कहा कि चयन प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए और नियुक्तियों के लिए आरक्षित सूचियों को “अनंत भंडार” के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
यह विवाद राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) द्वारा वर्ष 2013 से 2019 के बीच कनिष्ठ विधि अधिकारी (जेएलओ) और सहायक सांख्यिकी अधिकारी (एएसओ) के पदों के लिए आयोजित भर्ती अभियानों से उत्पन्न हुआ।
भाषा प्रशांत देवेंद्र
देवेंद्र

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