मंदिर में वर्ग के आधार पर प्रवेश रोके जाने से हिंदू धर्म बुरी तरह प्रभावित होगा : न्यायालय

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मंदिर में वर्ग के आधार पर प्रवेश रोके जाने से हिंदू धर्म बुरी तरह प्रभावित होगा : न्यायालय

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  • Publish Date - April 9, 2026 / 09:34 PM IST,
    Updated On - April 9, 2026 / 09:34 PM IST

नयी दिल्ली, नौ अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि यदि मंदिर और मठ पंथ तथा धर्म के भीतर के वर्गों के आधार पर प्रवेश पर रोक लगाते हैं, तो इससे हिंदू धर्म बुरी तरह से प्रभावित होगा और समाज बंट जाएगा।

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने वरिष्ठ वकील सी एस वैद्यनाथन की दलीलों का जवाब देते हुए यह टिप्पणी की।

वैद्यनाथन ने दलील दी थी कि संविधान का अनुच्छेद 26(बी) किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने कामकाज का प्रबंधन करने का अधिकार देता है, और इसे अनुच्छेद 25(2)(बी) पर वरीयता मिलेगी, जो सरकार को सभी सार्वजनिक हिंदू धार्मिक संस्थानों को आम लोगों के लिए खोलने का अधिकार देता है।

वैद्यनाथन केरल के शबरिमला मंदिर के भगवान अयप्पा के भक्तों की ओर से शीर्ष अदालत में उपस्थित हुए।

पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

पीठ शबरिमला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई तथा विभिन्न आस्थाओं के लोगों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार पर भी विचार कर रही थी।

नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम और क्षेत्र संरक्षण समिति जैसे संगठनों की ओर से पेश हुए वैद्यनाथन ने दलील दी कि किसी वर्ग विशेष का मंदिर अन्य व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति दे सकता है और उन्हें पूजा-अर्चना में शामिल कर सकता है, या फिर वह इसे केवल अपने वर्ग तक ही सीमित रख सकता है।

इस पर, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, ‘‘एक आशंका है। अगर आप प्रवेश के अधिकार की बात करते हैं, खासकर ‘वेंकटरमण देवरू’ मामले के संदर्भ में, जिसमें यह कहा गया था कि गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों के अलावा किसी और को प्रवेश नहीं मिलेगा, तो इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर पड़ेगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘प्रत्येक व्यक्ति को हर मंदिर और मठ में प्रवेश का अधिकार होना चाहिए। शबरिमला फैसले (2018) से जुड़े विवाद को एक तरफ रख दें। लेकिन अगर आप यह कहते हैं कि यह एक परंपरा है और यह धर्म का मामला है कि मैं दूसरों को बाहर रखूंगा और केवल मेरे वर्ग, मेरे संप्रदाय के लोग ही मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं, कोई और नहीं, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। धर्म पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यह उसके लिए नुकसानदायक ही साबित होगा।’’

इस बात से सहमत होते हुए, न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि इस तरह का निष्कासन समाज को बांट देगा।

वैद्यनाथन ने दलील दी कि असल में, केरल में ऐसे निजी पारिवारिक मंदिर हैं जहां केवल उन परिवारों के सदस्य ही जाते हैं। यदि मंदिर केवल अपने ही वर्ग के लिए होंगे, तो वे न तो सरकार से, न ही निजी दानदाताओं से और न ही आम लोगों से धन की मांग कर सकते हैं, क्योंकि वे उन पर निर्भर नहीं होंगे।

उन्होंने कहा कि अगर कोई कानून बनाया जाना है, तो उसे लोक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि वह ऐसे निजी मंदिरों का ज़िक्र नहीं कर रही थीं, और यदि ‘देवरू’ फैसले (1957) में हल किये गए मुद्दे को छोड़ दें तो ‘धर्म पर कोई बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए।’

उन्होंने वैद्यनाथन से शबरिमला विवाद को एक तरफ रखने को कहा और इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर यह तर्क दिया जाता है कि मंदिर में केवल गौड़ सारस्वत ब्राह्मण ही आ सकते हैं, कांची मठ के अनुयायी केवल कांची ही जाएं, उन्हें श्रृंगेरी नहीं जाना चाहिए, और श्रृंगेरी के अनुयायी कांची न जाएं — तो इसका धर्म पर असर पड़ेगा।

वैद्यनाथन ने कहा कि यह एक हकीकत है और हर संप्रदाय को इस बारे में सोचना चाहिए।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि सरकार, अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत दखल देकर समाज के सभी वर्गों के लिए मंदिरों में प्रवेश सुनिश्चित कर सकती है।

न्यायमूर्ति कुमार ने भी वैद्यनाथन से कहा, ‘‘इसलिए हमने कहा कि अपनी दलील ज़्यादा जोरदार तरीके से पेश न करें।’’ यह बात उन्होंने वैद्यनाथन की उस दलील के संदर्भ में कही, जिसमें उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 26(बी), अनुच्छेद 25(2)(बी) से ऊपर है।

नौ न्यायाधीशों की पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े सात सवाल तैयार किए हैं।

सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से दिए गए निर्णय में, 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध को हटा दिया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक परंपरा अवैध और असंवैधानिक है।

बाद में, 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक और पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न उपासना स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया।

पीठ ने सभी धर्मों में स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक मुद्दे तय करते हुए कहा कि किसी खास मामले के तथ्यों के बिना इन पर निर्णय नहीं किया जा सकता।

सुनवाई अगले हफ्ते जारी रही।

भाषा सुभाष माधव

माधव

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