नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने विधि पाठ्यक्रम और इसकी अवधि की समीक्षा के लिए शिक्षा आयोग बनाने के अनुरोध संबंधी याचिका में उठाए गए मुद्दे को महत्वपूर्ण बताते हुए मंगलवार को कहा कि कानूनी शिक्षा के लिए एक विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा, ‘‘यह दौर विशेषज्ञ निकायों का है और विधि की पढ़ाई के लिए भी एक विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए।’’
पीठ ने कहा, ‘‘यह एक अहम मुद्दा है और इसमें भारत सरकार की अहम भूमिका है। उन्हें इस पर कुछ करना चाहिए।’’
उच्चतम न्यायालय वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
याचिका में कहा गया है कि नयी शिक्षा नीति 2020 सभी पेशेवर और अकादमिक पाठ्यक्रम में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को बढ़ावा देती है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने ‘बैचलर ऑफ लॉ’ (एलएलबी) और ‘मास्टर ऑफ लॉ’ (एलएलएम) कार्यक्रम के मौजूदा पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या और अवधि की समीक्षा के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाए हैं।
इसमें कहा गया है कि बीए-एलएलबी और बीबीए-एलएलबी की पांच साल की अवधि पाठ्यक्रम की सामग्री के लिहाज से बहुत अधिक है और इतनी लंबी अवधि की वजह से छात्रों और उनके परिवारों पर बहुत ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ता है।
भाषा सुभाष अविनाश
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