राजद सांसदों का संसद परिसर में प्रदर्शन, 65 प्रतिशत आरक्षण नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

राजद सांसदों का संसद परिसर में प्रदर्शन, 65 प्रतिशत आरक्षण नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

राजद सांसदों का संसद परिसर में प्रदर्शन, 65 प्रतिशत आरक्षण नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग
Modified Date: March 27, 2026 / 12:47 pm IST
Published Date: March 27, 2026 12:47 pm IST

नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसदों ने शुक्रवार को संसद परिसर में प्रदर्शन किया और केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह बिहार सरकार द्वारा 2023 में भेजे उस प्रस्ताव को स्वीकार करे जिसमें 65 प्रतिशत आरक्षण को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की गई है।

राजद सांसदों ने संसद के मकर द्वार के निकट एकत्र होकर ‘नौवीं अनुसूची में शामिल करना होगा’ के नारे लगाए।

पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय यादव ने कहा, ‘‘जब तेजस्वी यादव बिहार सरकार का हिस्सा थे तो 65 प्रतिशत आरक्षण पारित किया गया था। बिहार की कैबिनेट ने प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था कि इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘केंद्र सरकार उस प्रस्ताव पर कुंडली मारकर बैठी है। यह दर्शाता है कि यह सरकार दलित, पिछड़े और आदिवासियों की विरोधी है। अगर वह इन वर्गों के खिलाफ नहीं है तो उस प्रस्ताव को स्वीकार करने में क्या दिक्कत है।’’

बिहार कैबिनेट ने वर्ष 2023 में केंद्र से आग्रह किया था कि राज्य सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में वंचित जातियों का आरक्षण 50 से बढ़ाकर 65 प्रतिशत किए जाने संबंधी संशोधित प्रावधानों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया जाए।

संविधान की नौवीं अनुसूची में केंद्रीय और राज्य कानूनों की एक सूची शामिल है जिन्हें अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 1992 में उच्चतम न्यायालय ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी।

बिहार में जाति सर्वेक्षण के बाद, विधानसभा ने आरक्षण बढ़ाने के लिए दो विधेयक पारित किए थे। विधेयकों में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षण 16 से बढ़ाकर 20 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 1 से बढ़ाकर 2 प्रतिशत, अति पिछड़ी जाति (ईबीसी) के लिए 18 से बढ़ाकर 25 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग ( ओबीसी) के लिए 15 से बढ़ाकर 18 प्रतिशत करने का प्रावधान किया गया था, जिसके साथ ही जाति-आधारित आरक्षण की कुल मात्रा 50 से बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई थी।

भाषा हक

हक वैभव

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