नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने चार वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने एवं जांच के प्रति गाजियाबाद पुलिस की ‘‘आनाकानी’’ पर सोमवार को चिंता जताई।
पुलिस की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को सूचित किया कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की धाराओं के तहत तीन अप्रैल को आरोपपत्र दायर किया गया था।
भाटी ने कहा कि संबंधित अदालत ने भी आरोपपत्र का संज्ञान लिया है।
शीर्ष अदालत ने दो निजी अस्पतालों, खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल को भी आरोपों पर हलफनामा दाखिल करने निर्देश दिया है।
इन अस्पतालों ने बच्ची को कथित तौर पर इलाज देने से इनकार कर दिया था, जिसे बाद में एक सरकारी अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, ‘‘प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी की गई, जांच में आनाकानी की गई, हर चीज में आनाकानी हुई।’’
पीठ बच्ची के पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो एक दिहाड़ी मजदूर है। इस याचिका में मामले की अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) या सीबीआई से जांच कराए जाने का अनुरोध किया गया है।
गत 16 मार्च को बच्ची को कथित तौर पर एक पड़ोसी चॉकलेट दिलाने के बहाने बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। जब बच्ची वापस नहीं लौटी, तो उसके पिता ने उसकी तलाश शुरू की, जो बेहोश और खून से लथपथ मिली।
सोमवार को सुनवाई के दौरान, पीठ ने कहा कि उसके समक्ष पुलिस ने एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी।
पीठ ने कहा, ‘‘10 अप्रैल के आदेश में हमने जिन विभिन्न मुद्दों को संक्षेप में उठाया है, उन पर विचार करने से पहले, हम पुलिस को बच्ची के परिवार को आरोपपत्र की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश देते हैं।’’
बच्ची के पिता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने कहा कि अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बच्ची की मौत इसलिए हुई क्योंकि उसे सही समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई।
हरिहरन ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने बार-बार कहा है कि चिकित्सा उपचार से इनकार नहीं किया जा सकता और यदि समय पर उपचार उपलब्ध कराया गया होता तो बच्ची की जान बच सकती थी।
उन्होंने कहा कि पुलिस ने बयान दर्ज किए हैं कि बच्ची सांस लेती हुई नहीं मिली, लेकिन वीडियो में कुछ और ही दिखता है।
हरिहरन ने कहा कि यह घटना 16 मार्च को हुई थी, लेकिन 17 मार्च की रात 3:30 बजे तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘प्राथमिकी केवल हत्या के संबंध में दर्ज की गई थी। इसमें बलात्कार या गंभीर यौन हमले का कोई जिक्र नहीं था।’’
पीठ ने टिप्पणी की कि वह याचिकाकर्ता की चिंता को अच्छी तरह से समझ सकती है, लेकिन अभियोजन को उस आरोपी पर अधिक लक्षित किया जाना चाहिए जिसके खिलाफ आरोप लगाए गए हैं।
इसने हरिहरन को आरोपपत्र की प्रति देखने के लिए कहा।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘साथ ही, एसआईटी के गठन को लेकर हमारी अत्यधिक चिंता में, हमें इस प्रक्रिया में देरी नहीं करनी चाहिए।’’
इसने कहा कि आरोपपत्र की पड़ताल के बाद याचिकाकर्ता यह बता सकता है कि क्या उसमें कोई खामी है और क्या विशेष जांच समिति (एसआईटी) की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि वह इस मामले को बंद नहीं कर रही है।
न्यायालय ने मामले की सुनवाई अगले सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।
इसने 10 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए मामले की जांच में गाजियाबाद पुलिस के ‘‘असंवेदनशील रवैये’’ की कड़ी आलोचना की थी।
पीठ ने राज्य सरकार, संबंधित थाना प्रभारी, दो निजी अस्पतालों और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए थे।
इसने पुलिस और अस्पतालों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि बच्ची और उसके परिवार के सदस्यों की पहचान उजागर न हो तथा उन्हें रिकॉर्ड से ऐसी कोई भी जानकारी हटा देनी चाहिए।
पीठ ने राज्य पुलिस को पीड़ित परिवार को परेशान न करने का भी निर्देश दिया था।
न्यायालय ने गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों द्वारा बच्ची को भर्ती न किए जाने पर खेद व्यक्त किया था, जिसे बाद में सरकारी अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया था।
भाषा नेत्रपाल नरेश
नरेश