वैज्ञानिकों ने एआई आधारित मॉडल बनाया, नींद के आंकड़ों से बीमारी के खतरे का लगायेगा पता

वैज्ञानिकों ने एआई आधारित मॉडल बनाया, नींद के आंकड़ों से बीमारी के खतरे का लगायेगा पता

वैज्ञानिकों ने एआई आधारित मॉडल बनाया, नींद के आंकड़ों से बीमारी के खतरे का लगायेगा पता
Modified Date: January 7, 2026 / 03:53 pm IST
Published Date: January 7, 2026 3:53 pm IST

नयी दिल्ली, सात जनवरी (भाषा) अनुसंधानकर्ताओं ने कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल करके एक मॉडल बनाया है जो नींद के आंकड़ों से 100 से अधिक अलग-अलग स्वास्थ्य स्थिति के खतरे का अनुमान लगा सकता है। एक शोध में इसकी जानकारी दी गयी है।

इस मॉडल को ‘स्लीपएफएम’ नाम दिया गया है, जिसे अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं समेत अन्य लोगों ने मिलकर बनाया है। इस अनुसंधान में 65,000 लोगों ने हिस्सा लिया और उनसे एकत्र किये गये करीब छह लाख घंटे के नींद के आंकड़ों पर इसे प्रशिक्षित किया गया है।

‘नेचर मेडिसिन’ नामक पत्रिका में छपे एक पेपर में बतायी गयी इस कृत्रिम मेधा प्रणाली को शुरू में नींद के विश्लेषण से जुड़े मानक कार्यों पर परखा गया था, जैसे नींद के अलग-अलग चरण को रिकार्ड करना या स्लीप एपनिया की गंभीरता का पता लगाना।

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इसके बाद इस मॉडल का इस्तेमाल नींद के आंकड़ों का विश्लेषण करके भविष्य में होने वाली बीमारी का अनुमान लगाने के लिए किया गया, जिसमें हेल्थ रिकॉर्ड का डेटा एक स्लीप क्लिनिक से लिया गया था।

अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि स्वास्थ्य रिकॉर्ड में 1,000 से ज़्यादा बीमारियों की श्रेणी रखी गईं और मरीज के सोने के आंकड़ों का इस्तेमाल करके 130 बीमारियों का अंदाज़ा सटीकता से लगाया जा सका।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘मनोरोग एवं व्यवहार विज्ञान’ विभाग में स्लीप मेडिसिन के प्रोफेसर और सीनियर लेखक इमैनुएल मिग्नोट ने कहा, ‘जब हम नींद का अध्ययन करते हैं तो हम बहुत सारे सिग्नल रिकॉर्ड करते हैं। यह एक तरह की जनरल फिजियोलॉजी है जिसका हम एक ऐसे व्यक्ति पर आठ घंटे तक अध्ययन करते हैं जो पूरी तरह से हमारे कंट्रोल में होता है। इसमें बहुत सारा डेटा होता है।’’

पॉलीसोम्नोग्राफी – जिसे नींद के अध्ययन में गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है – नींद का डेटा इकट्ठा करने का एक आम तरीका है जो सेंसर का इस्तेमाल करके दिमाग की एक्टिविटी, दिल के काम, सांस के सिग्नल और आंखों की हरकतों के साथ-साथ दूसरी चीज़ों को रिकॉर्ड करता है।

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि एआई मॉडल कई तरह के डेटा को शामिल करने में सक्षम था – जैसे इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी), इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी, इलेक्ट्रोमायोग्राफी (मांसपेशियों की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी), पल्स रीडिंग और सांस लेने का एयरफ्लो – और यह पता लगाने में कि वे एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं।

उन्होंने बताया कि एआई प्रणाली के अनुमान कैंसर, प्रेग्नेंसी की दिक्कतों, सर्कुलेटरी बीमारियों और मेंटल डिसऑर्डर के लिए खास तौर पर बहुत अच्छे पाए गए ।

भाषा रंजन रंजन नरेश

नरेश


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