राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों के चयन ने दिए नई राजनीतिक दिशा के संकेत

राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों के चयन ने दिए नई राजनीतिक दिशा के संकेत

राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों के चयन ने दिए नई राजनीतिक दिशा के संकेत
Modified Date: July 10, 2026 / 01:30 pm IST
Published Date: July 10, 2026 1:30 pm IST

(प्रदीप्त तापदार)

कोलकाता, 10 जुलाई (भाषा) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तृणमूल कांग्रेस के तीन पूर्व राज्यसभा सदस्यों को अपनी पार्टी में शामिल करने के कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसे इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी अब राज्य की राजनीति में विपक्ष के चुनिंदा नेताओं को अपने साथ जोड़कर और संगठन का विस्तार कर अपनी स्थिति को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बराइक बृहस्पतिवार को भाजपा में शामिल हुए और कुछ ही घंटों के भीतर पश्चिम बंगाल से होने वाले राज्यसभा उपचुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवार घोषित कर दिए गए।

विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद यह पहली बार है जब भाजपा ने तृणमूल के पूर्व नेताओं को अपने दल में शामिल किया है। इससे यह संकेत भी मिला है कि चुनाव के बाद तृणमूल नेताओं के प्रवेश पर लगाया गया अनौपचारिक प्रतिबंध उन नेताओं पर लागू नहीं होगा जिन्हें भाजपा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त मानती है।

सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बराइक ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल की हार के बाद राज्यसभा की सदस्यता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया था। अब वे लगभग एक महीने बाद भाजपा के टिकट पर फिर से संसद पहुंचने के लिए तैयार हैं।

सत्ता में आने के बाद भाजपा नेताओं ने कई सप्ताह तक सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे तृणमूल के नेताओं को बिना सोच-समझे पार्टी में शामिल नहीं करेंगे। भाजपा लगातार पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार पर भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोप लगाती रही है।

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इन नेताओं को शामिल किए जाने को ‘‘असाधारण’’ मामला बताया और कहा कि इससे पार्टी की पहले की नीति में कोई बदलाव नहीं माना जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भाजपा के दरवाजे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तृणमूल नेताओं के लिए बंद हैं, लेकिन जिन्होंने भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग में हिस्सा नहीं लिया, उनका पार्टी में स्वागत है।

विधानसभा चुनाव के बाद अपने राजनीतिक भविष्य पर पुनर्विचार कर रहे विपक्षी नेताओं के लिए भाजपा ने यह संदेश दिया है कि राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नेताओं को पार्टी में सिर्फ जगह ही नहीं मिलेगी, बल्कि उन्हें सम्मानजनक पहचान भी दी जाएगी।

निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के अनुसार, राज्यसभा की तीनों रिक्त सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव होंगे और प्रत्येक सीट को स्वतंत्र चुनाव माना जाएगा। हालांकि तीनों उपचुनाव एक ही कार्यक्रम के तहत कराए जाएंगे।

पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 207 विधायक हैं। ऐसे में पार्टी प्रत्येक सीट पर अपने दम पर जीत हासिल करने की स्थिति में है।

इसके विपरीत विपक्ष की स्थिति बेहद कमजोर है। यहां तक कि यदि ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट भी साथ आ जाएं, जिसकी संभावना बेहद कम है, तब भी उनके पास मिलाकर लगभग 80 विधायक ही हैं।

तीनों राज्यसभा सीटों का चुनाव एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग कराया जा रहा है इसलिए हर सीट पर जीत के लिए अलग-अलग बहुमत चाहिए। भाजपा के पास अपने दम पर पर्याप्त विधायक हैं, जबकि विपक्ष के पास किसी एक सीट के लिए भी पर्याप्त संख्या नहीं है।

इसी कारण भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ तृणमूल के तीनों पूर्व सांसदों को मैदान में उतार सकी।

सत्ता संभालने के बाद भाजपा की प्राथमिकताओं में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। अब उसका जोर राजनीतिक मजबूती पर है। पार्टी अनुभवी विपक्षी नेताओं को अपने साथ जोड़कर अपने संगठन का विस्तार करना चाहती है और यह संदेश देना चाहती है कि अब बंगाल की राजनीति का प्रमुख केंद्र भाजपा बन चुकी है।

दूसरी ओर, विधानसभा चुनाव में हार के कुछ ही सप्ताह बाद तृणमूल के तीन वरिष्ठ सांसदों के पार्टी छोड़ने से यह धारणा मजबूत हुई है कि पार्टी संगठनात्मक दबाव से गुजर रही है।

तृणमूल के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने कहा, ‘‘ये सीटें तृणमूल कांग्रेस की थीं। चुनाव के बाद पार्टी छोड़ने वालों का फैसला बंगाल की जनता करेगी। इतिहास गद्दारों के प्रति कभी उदार नहीं रहा।’’

हालांकि, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘विधानसभा चुनाव ने बंगाल की राजनीति की तस्वीर बदल दी है। जो अनुभवी और बेदाग नेता जनता के जनादेश को स्वीकार करते हैं और बंगाल के पुनर्निर्माण में योगदान देना चाहते हैं, उनके लिए भाजपा में जगह है।’’

इस घटनाक्रम की तुलना ओडिशा से भी की जा रही है, जहां सत्ता में आने के बाद भाजपा ने बीजू जनता दल (बीजद) के पूर्व राज्यसभा सदस्यों को अपनी पार्टी में शामिल कर उपचुनाव के जरिए उन्हें फिर संसद पहुंचाया था।

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘विधानसभा चुनाव जीतना भाजपा के लिए केवल शुरुआत थी। अब पार्टी अपनी चुनावी बढ़त को दीर्घकालिक राजनीतिक और संगठनात्मक मजबूती में बदलने की कोशिश कर रही है। राज्यसभा उपचुनाव के लिए किए गए ये नामांकन उसी रणनीति का हिस्सा हैं।’’

भाषा गोला नरेश

नरेश


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