बच्चों के लिए अलग नशामुक्ति केंद्र की सिफारिश, स्कूलों में ‘प्रहरी क्लब’ बनाने का प्रस्ताव

बच्चों के लिए अलग नशामुक्ति केंद्र की सिफारिश, स्कूलों में ‘प्रहरी क्लब’ बनाने का प्रस्ताव

बच्चों के लिए अलग नशामुक्ति केंद्र की सिफारिश, स्कूलों में ‘प्रहरी क्लब’ बनाने का प्रस्ताव
Modified Date: September 9, 2026 / 04:16 pm IST
Published Date: September 9, 2026 4:16 pm IST

नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले अथवा उन पर निर्भर बच्चों के लिए अलग नशामुक्ति केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है। आयोग ने कहा है कि बच्चों के विकास, सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी जरूरतें अलग होती हैं।

आयोग ने सभी स्कूलों में बच्चों में मादक पदार्थों के सेवन की समस्या से निपटने के लिए ‘प्रहरी क्लब’ स्थापित करने का भी प्रस्ताव दिया है।

एनसीपीसीआर द्वारा तैयार ‘बच्चों में नशीली दवाओं और मादक पदार्थों के सेवन की रोकथाम एवं प्रतिक्रिया संबंधी रूपरेखा’ नामक मसौदा दिशानिर्देश/मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में अधिकारियों से बच्चों के प्रति दंडात्मक रवैया नहीं अपनाने को कहा गया है।

मसौदे के अनुसार, किसी बच्चे द्वारा मादक पदार्थों का सेवन किए जाने का संदेह होने या इसकी पुष्टि होने पर उसे स्कूल से निलंबित या निष्कासित नहीं किया जाना चाहिए और न ही सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाना चाहिए। ऐसे बच्चों को अपराधी के बजाय ‘देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चे’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

मसौदे में कहा गया है कि राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग में कमी कार्ययोजना (एनएपीडीडीआर) के तहत चल रहे नशामुक्ति केंद्रों में फिलहाल अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों को एक साथ सेवाएं दी जाती हैं।

बच्चों की विशिष्ट विकासात्मक, सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी जरूरतों को देखते हुए राज्य सरकारों को मौजूदा केंद्रों में धीरे-धीरे बच्चों के लिए अलग वार्ड, बिस्तर या उपचार के लिए विशेष समय की व्यवस्था करनी चाहिए।

इसमें आगे प्रस्ताव दिया गया है कि जहां जिलों में ऐसे मामलों की संख्या इसकी जरूरत को उचित ठहराती हो, वहां राज्य सरकारों को बच्चों के लिए विशेष रूप से अलग नशामुक्ति केंद्र स्थापित करने चाहिए। इन जिलों में बच्चों के अनुकूल और मानसिक आघात (ट्रॉमा) को ध्यान में रखते हुए देखभाल का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके कर्मचारी तैनात हों।

मसौदे में कहा गया है कि जब तक ऐसी अलग सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो जातीं, तब तक विभिन्न आयु वर्ग के लिए निर्धारित नशामुक्ति केंद्रों में भेजे गए बच्चों को वयस्क मरीजों से अलग रखा जाना चाहिए और उपचार के दौरान उनके साथ माता-पिता, अभिभावक या अधिकृत अधिकारी में से कोई एक मौजूद रहना चाहिए। यह व्यवस्था किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत बाल संरक्षण संबंधी सुरक्षा उपायों के अनुरूप होनी चाहिए।

आयोग ने कहा कि नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले या उन पर निर्भर पाए गए बच्चे अन्य बच्चों के साथ बाल देखभाल संस्थानों में रखने के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते, क्योंकि उनकी उपचार, सुरक्षा और मनोसामाजिक जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए उनके लिए अलग और बच्चों के अनुकूल नशामुक्ति सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।

मसौदा एसओपी में कहा गया है कि प्रत्येक स्कूल को विद्यार्थियों के स्वयंसेवकों का ‘प्रहरी क्लब’ स्थापित या मजबूत करना चाहिए। ये क्लब साथियों के स्तर पर नशे की रोकथाम संबंधी गतिविधियों का नेतृत्व करेंगे और विद्यार्थियों को अपनी चिंताएं बताने के लिए सुरक्षित और गोपनीय माध्यम उपलब्ध कराएंगे।

प्रहरी क्लब की बैठक कम से कम महीने में एक बार होनी चाहिए तथा उसकी गतिविधियों का दस्तावेजीकरण और समीक्षा संबंधित नोडल शिक्षक द्वारा की जानी चाहिए।

मसौदे में बच्चों के प्रति सख्त गैर-दंडात्मक रवैया अपनाने की बात कही गई है। अधिकारियों को बच्चे की बात बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनने, उसे सहयोग का भरोसा दिलाने, उसकी पहचान और मामले से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखने तथा उसे निर्धारित परामर्शदाता, चिकित्सा अधिकारी या जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) के पास भेजने को कहा गया है। बच्चे की शिक्षा और सामान्य गतिविधियों तक उसकी पहुंच भी जारी रहनी चाहिए।

अधिकारियों को माता-पिता या अभिभावकों तथा बच्चे को सहयोगात्मक तरीके से प्रक्रिया में शामिल करने, घटनाओं का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण करने और निर्धारित माध्यम से रिपोर्ट करने को कहा गया है।

मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बच्चे को अपराधी के बजाय ‘देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चे’ के रूप में देखा जाना चाहिए। केवल किसी पदार्थ का सेवन करने या अपने पास रखने के कारण बच्चे को ‘कानून का उल्लंघन करने वाला बच्चा’ नहीं माना जाना चाहिए।

ऐसा वर्गीकरण जिला बाल संरक्षण इकाई और पुलिस द्वारा मामले के आधार पर किए गए आकलन के बाद ही किया जाना चाहिए और केवल नशीले पदार्थों के सेवन के आधार पर ऐसी धारणा नहीं बनाई जानी चाहिए।

एनसीपीसीआर ने मसौदे पर सुझाव आमंत्रित किए हैं। प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद आयोग एसओपी को अंतिम रूप देगा। आयोग ने कहा कि वह बाल अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दिशानिर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार करता है। मसौदे पर सुझाव नौ अक्टूबर, 2026 तक भेजे जा सकते हैं।

भाषा रवि कांत रवि कांत संतोष

संतोष


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