सत्र अदालत हत्या के लिए ‘अंतिम सांस’ तक जेल में रहने की सजा नहीं सुना सकती : उच्चतम न्यायालय

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सत्र अदालत हत्या के लिए ‘अंतिम सांस’ तक जेल में रहने की सजा नहीं सुना सकती : उच्चतम न्यायालय

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  • Publish Date - September 24, 2026 / 10:23 PM IST,
    Updated On - September 24, 2026 / 10:23 PM IST

नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि हत्या के मामले में किसी आरोपी को दोषी ठहराते समय सत्र अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि दोषी अपने जीवन के शेष समय तक जेल में रहेगा।

यह फैसला इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल से जुड़ा था कि क्या भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाते समय निचली अदालत यह स्पष्ट कर सकती है कि दोषी को वैधानिक रूप से मिलने वाली सजा में छूट और सजा में परिवर्तन के लाभ के बिना जीवनभर जेल में रहना होगा।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘हालांकि, उम्रकैद का अर्थ दोषी के जीवन के शेष समय तक कारावास है, लेकिन सजा में छूट और सजा में परिवर्तन की वैधानिक शक्तियों को सत्र अदालत सीमित नहीं कर सकती। इसलिए, बिना छूट के उम्रकैद की विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है, सत्र अदालत के पास नहीं।’’

पीठ ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सजा में छूट और सजा में परिवर्तन की शक्ति को सत्र अदालत सीमित नहीं कर सकती।

पीठ ने कहा कि ‘‘सत्र अदालत द्वारा उम्रकैद की सजा को दोषी के जीवन के अंत तक जारी रखने का निर्देश वैधानिक व्यवस्था के विपरीत है।’’

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए पीठ ने एक तिहरे हत्याकांड में एक व्यक्ति और एक अन्य दोषी की दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, जीवन के शेष समय तक कारावास की सजा को बदलकर 25 साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया गया।

भाषा शफीक वैभव

वैभव