शिंदे गुट अब भी दल-बदल से मिले लाभों का आनंद उठा रहा है: शिवसेना (उबाठा)
शिंदे गुट अब भी दल-बदल से मिले लाभों का आनंद उठा रहा है: शिवसेना (उबाठा)
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) शिवसेना (उबाठा) ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट अब भी ‘‘दल-बदल से मिले फायदों’’ का आनंद उठा रहा है और निर्वाचन आयोग ने मुख्य रूप से विधानसभा में विधायकों के बहुमत को आधार बनाकर ‘शिवसेना’ का नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंप दिया।
ये दलीलें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष दी गईं। पीठ ने सातवें दिन भी उद्धव ठाकरे गुट की उस याचिका पर सुनवाई जारी रखी, जिसमें निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया और पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ उन्हें (शिंदे गुट को) सौंप दिया गया।
ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा कि शिंदे गुट अब भी उस दल-बदल के लाभ उठा रहा है, क्योंकि निर्वाचन आयोग का चुनाव चिह्न संबंधी आदेश विधानसभा में बहुमत की कसौटी पर आधारित था।
कामत ने कहा, ‘‘इस मामले में, उन्होंने पहले ही दल-बदल के फायदे उठा लिए हैं, क्योंकि इस मामले की समय पर सुनवाई नहीं हो सकी। हम किसी को दोष नहीं दे रहे हैं। लेकिन, वे आज भी उन लाभों का आनंद उठा रहे हैं। चुनाव चिह्न संबंधी आदेश विधायी बहुमत की कसौटी के आधार पर कायम है।’’
कामत ने कहा, ‘‘एक बार अयोग्य ठहराए जाने के बाद, वे अपनी सदस्यता खो देते हैं।’’ उन्होंने कहा कि कथित तौर पर दल-बदल करने वाले लोग अयोग्य ठहराये जाने के अनुरोध संबंधी याचिकाओं पर फैसला लेने में हुई देरी का पहले ही लाभ उठा चुके हैं।’’
पीठ ने कामत से मांगी जा रही राहत के दायरे के बारे में सवाल किया।
पीठ ने पूछा, ‘‘किस चीज से अयोग्य ठहराया जाए?’’
कामत ने जवाब दिया कि अयोग्य ठहराया जाना दल-बदल के कृत्य से उत्पन्न होने वाला कानूनी परिणाम है। उन्होंने कहा, ‘‘यह एक कानूनी घोषणा है कि जिस तारीख को दल-बदल किया गया, उसी तारीख से सदस्य ने अपनी सदस्यता खो दी थी।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अतीत में उच्चतम न्यायालय ने उचित परिस्थितियों में मामले को विधानसभा अध्यक्ष के पास वापस भेजने के बजाय स्वयं ही अयोग्यता के मामले में फैसला लिया है।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले यह स्पष्ट कर चुकी है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत संवैधानिक व्यवस्था को विधानसभा अध्यक्ष की निष्क्रियता या उनके द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण कमजोर नहीं होने दिया जा सकता।
उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का वह आदेश, जिसने शिंदे गुट के पक्ष में फैसला दिया था, अवैध था और इसका चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर “निश्चित तौर पर प्रभाव” पड़ा।
बुधवार को ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि शिंदे गुट को ‘‘असली’’ पार्टी के तौर पर मान्यता देना एक ‘‘संवैधानिक पाप’’ को इनाम देने जैसा होगा।
ठाकरे गुट ने अपनी दलीलें पूरी कर ली हैं।
शिंदे गुट दो सितंबर को अपनी अंतिम दलीलें फिर से रखना शुरू करेगा।
भाषा
देवेंद्र संतोष
संतोष

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