सिद्धरमैया का जनता परिवार के नेता से सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
सिद्धरमैया का जनता परिवार के नेता से सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
(फाइल फोटो के साथ)
बेंगलुरु, छह जनवरी (भाषा) उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार के साथ ‘कुर्सी’ को लेकर कई दिनों तक चली खींचतान के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धरमैया कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का एक अनूठा रिकॉर्ड बनाने की दहलीज पर हैं।
‘जनता परिवार’ से दो दशक से अधिक समय तक जुड़े रहे और अतीत में कांग्रेस-विरोधी तेवरों के लिए जाने जाने वाले 77 वर्षीय सिद्धरमैया ने सबसे लंबे समय तक कर्नाटक का मुख्यमंत्री रहने के मामले में दिवंगत नेता देवराज उर्स के रिकॉर्ड की मंगलवार को बराबरी कर ली।
मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में सिद्धरमैया ने 2,792 दिन पद पर रहकर, राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के मामले में उर्स के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है और सात जनवरी से यह रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो जाएगा।
राज्य में सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों का प्रतीक माने जाने वाले उर्स राज्य के दो बार (1972-1977, 1978-1980) मुख्यमंत्री रहे। सिद्धरमैया उर्स के बाद पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले राज्य के एकमात्र मुख्यमंत्री हैं। सिद्धरमैया अपने पहले कार्यकाल में 13 मई 2013 से 15 मई 2018 तक 1,829 दिन पद पर रहे।
अपने दूसरे कार्यकाल में 20 मई, 2023 से अब तक उन्होंने 963 दिन पूरे कर लिए हैं। हालांकि दूसरे कार्यकाल में शिवकुमार के समर्थकों ने कथित सत्ता-साझेदारी फॉर्मूले के तहत उपमुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री बनाए जाने की जोरदार मांग कर इस रिकॉर्ड में बाधा बनने की कोशिश की थी।
गरीब किसान परिवार से संबंध रखने वाले सिद्धरमैया 1980 के दशक की शुरुआत से 2005 तक कट्टर कांग्रेस विरोधी रहे लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा की जनता दल-सेक्युलर (जद-एस) से निकाले जाने के बाद वह राजनीतिक चौराहे पर आ खड़े हुए और उसी पार्टी में शामिल हो गए जिसके वह विरोधी रहे थे।
सिद्धरमैया ने अपने धैर्य और दृढ़ता के बूते अपने जीवन की महत्वाकांक्षा पूरी की और 2013 में मुख्यमंत्री बने। अपनी बेबाकी के लिए जाने जाने वाले नौ बार के विधायक सिद्धरमैया 2023 में एक और कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनाए गए।
सिद्धरमैया ने मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल अंतिम बार पूरा करने की अपनी महत्वाकांक्षा को कभी नहीं छिपाया और वह एक शानदार विदाई की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि, चुनावी राजनीति में बने रहने के बारे में उन्होंने मिले-जुले संकेत दिए हैं।
सिद्धरमैया कांग्रेस के दिग्गजों को पछाड़कर मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 2023 में शिवकुमार को और एक दशक पहले एम मल्लिकार्जुन खरगे (अब अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष) को पछाड़कर मुख्यमंत्री पद हासिल किया।
राज्य में 2004 में खंडित जनादेश के बाद कांग्रेस और जद(एस) ने गठबंधन सरकार बनाई और उस समय जद(एस) में रहे सिद्धरमैया को उपमुख्यमंत्री बनाया गया जबकि कांग्रेस के एन धर्म सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया।
सिद्धरमैया को यह मलाल रहा कि तब उनके पास राज्य का नेतृत्व करने का अवसर था लेकिन देवेगौड़ा ने उनकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया।
कर्नाटक की तीसरी सबसे बड़ी जाति कुरुबा से संबंध रखने वाले सिद्धरमैया ने इसके बाद 2005 में खुद को पिछड़ा वर्ग के नेता के रूप में स्थापित करने का विकल्प चुना और अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित के लिए कन्नड़ का संक्षिप्त शब्द) सम्मेलनों का नेतृत्व किया। संयोग से उसी समय पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के बेटे एच डी कुमारस्वामी को पार्टी के उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा था।
सिद्धरमैया को जद(एस) से निकाल दिया गया जिसमें वह पहले राज्य इकाई के प्रमुख रह चुके थे। पार्टी के आलोचकों ने उस समय दावा किया था कि देवेगौड़ा, कुमारस्वामी को आगे बढ़ाना चाहते थे इसलिए सिद्धरमैया को हटाया गया।
पेशे से वकील सिद्धरमैया ने उस समय ‘राजनीतिक संन्यास’ की बात की और वकालत में लौटने पर भी विचार किया। उन्होंने क्षेत्रीय दल बनाने की संभावना से इनकार करते हुए कहा कि वे इसके लिए धनबल नहीं जुटा सकते। तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस ने उन्हें अपनी-अपनी पार्टी में शामिल करने के प्रयास किए।
सिद्धरमैया ने कहा कि वह भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं हैं और वह 2006 में अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। कुछ साल पहले तक ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था कि सिद्धरमैया कांग्रेस में शामिल होंगे।
वह 2004 में मुख्यमंत्री बनने का मौका बेहद करीबी अंतर से चूक गए। उस समय जे एच पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया और उनकी मंत्रिपरिषद में सिद्धरमैया उपमुख्यमंत्री रहे। देवेगौड़ा और पटेल के कार्यकाल में उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में काम किया। सिद्धरमैया के नाम राज्य के 16 बजट पेश करने का विशिष्ट रिकॉर्ड है।
सिद्धरमैया डॉ राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आदर्शों से प्रभावित रहे।
मैसूरु के चामुंडेश्वरी विधानसभा क्षेत्र से लोक दल पार्टी के टिकट पर 1983 में चुनाव जीतकर विधानसभा में पदार्पण करने वाले सिद्धरमैया बाद में तत्कालीन सत्तारूढ़ जनता पार्टी में शामिल हो गए।
उन्हें 1989 और 1999 में विधानसभा चुनाव और 1991 में लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद 2008 में वह कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति (केपीसीसी) की चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष रहे। उस चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद वह विपक्ष के नेता बने और उन्होंने भ्रष्टाचार, घोटालों एवं अवैध खनन को लेकर भाजपा सरकार पर जोरदार हमला बोला।
प्रशासनिक दक्षता के लिए जाने जाने वाले सिद्धरमैया ने 2013-18 के बीच कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में सफल पांच वर्षीय कार्यकाल का नेतृत्व किया। कांग्रेस को 2018 में हार का सामना करना पड़ा। उस समय सिद्धरमैया स्वयं 2018 में मैसूरु की चामुंडेश्वरी सीट पर जद(एस) के जी टी देवेगौड़ा से 36,042 मतों से हार गए थे लेकिन उन्होंने बागलकोट जिले की बादामी सीट से जीत हासिल की थी।
सिद्धरमैया 2018 के चुनाव के बाद कांग्रेस-जद(एस) सरकार की गठबंधन समन्वय समिति के प्रमुख रहे और भाजपा के सत्ता में आने के बाद वह नेता प्रतिपक्ष बने। सिद्धरमैया ने घोषणा की 2023 के बाद वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र वरुणा से जीत हासिल की। उन्होंने तब कहा था कि यह उनका अंतिम चुनाव हो सकता है लेकिन इसके बाद भी वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे।
भाषा सिम्मी मनीषा
मनीषा

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