विशेष एनआईए अदालत ने पुलवामा आतंकी हमले की आरोपी इंशा जान की जमानत अर्जी खारिज की

विशेष एनआईए अदालत ने पुलवामा आतंकी हमले की आरोपी इंशा जान की जमानत अर्जी खारिज की

विशेष एनआईए अदालत ने पुलवामा आतंकी हमले की आरोपी इंशा जान की जमानत अर्जी खारिज की
Modified Date: August 22, 2026 / 01:13 pm IST
Published Date: August 22, 2026 1:13 pm IST

जम्मू, 22 अगस्त (भाषा) जम्मू की एक विशेष एनआईए अदालत ने 2019 में सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत से संबद्ध पुलवामा आत्मघाती हमले की आरोपी इंशा जान उर्फ ​​इंशा तारिक की ज़मानत अर्जी खारिज कर दी।

अदालत ने कहा कि यह मानने के लिए पर्याप्त पर्याप्त सबूत हैं कि उस पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं।

विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने 20 अगस्त को 15 पन्नों के आदेश में कहा कि गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43-डी (5) के तहत कानूनी रोक लागू होती है और इस चरण पर उसे रिहा करने से रोकती है।

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले के हरकीपोरा गांव की रहने वाली जान को तीन मार्च, 2020 को उसके पिता पीर तारिक अहमद शाह के साथ गिरफ्तार किया गया था।

जान के खिलाफ रणबीर दंड संहिता , यूएपीए, हथियार कानून और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम लगाये गये हैं। अदालत ने 10 दिसंबर, 2022 को उसके खिलाफ आरोप तय किए थे।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के आरोपपत्र के मुताबिक, जान कथित तौर पर आतंकी साज़िश में शामिल थी और पाकिस्तानी आतंकवादी मुहम्मद उमर फारूक के लगातार संपर्क में थी। फ़ारूक एक और पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद कामरान अली के साथ मिलकर पुलवामा हमले की साजिश में शामिल था। बाद में सुरक्षा बलों ने अलग-अलग मुठभेड़ों में उन्हें मार गिराया था।

जान पर दो आतंकवादियों और जैश-ए-मोहम्मद के दूसरे सदस्यों को खाना खिलाने, ठहराने और दूसरी जरूरी मदद देने का भी आरोप है।

इसके अलावा, 14 फरवरी 2019 के हमले के बाद प्रसारित हुए आत्मघाती बम हमलावर आदिल अहमद डार के वीडियो को कथित तौर पर 28 और 29 जनवरी को जान के घर पर ही रिकॉर्ड किया गया था।

अदालत ने बचाव पक्ष एवं एनआईए की दलीलें सुनने के बाद जान की जमानत अर्जी खारिज कर दी।

बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से जान की लंबी हिरासत, मुकदमे में कथित देरी और उसकी सेहत की स्थिति का हवाला दिया, जबकि एनआईए ने आरोपों की गंभीरता, जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों और यूएपीए की धारा 43-डी(5) के तहत लगाई गई पाबंदियों का ज़िक्र करते हुए ज़मानत अर्ज़ी का विरोध किया।

बचाव पक्ष ने कहा कि जान छह साल से ज़्यादा समय से हिरासत में है । उसने तर्क दिया कि मुकदमे में लंबी देरी के कारण उसकी मुवक्किल की हिरासत को जारी रखना अनुचित है।

भाषा राजकुमार रंजन

रंजन


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