नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने संविधान की दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर पुनर्विचार का अनुरोध करने संबंधी वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की याचिका को 27 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर बुधवार को सहमति जताई।
दसवीं अनुसूची के तहत विधायक और सांसद किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय का दावा करके दल-बदल रोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने से बच सकते हैं।
निर्दलीय राज्यसभा सदस्य सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ से कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत क्षमता से याचिका दायर की है और इसे तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘मैंने स्वयं याचिका दायर की है। यह इस सवाल से जुड़ी है कि क्या संसद की संरचना उस तरीके से बदल सकती है, जैसा इस देश में हो रहा है और इस संदर्भ में दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद चार की व्याख्या किस प्रकार की जानी चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि इसी तरह की अन्य याचिकाएं भी उच्चतम न्यायालय में लंबित हैं। प्रधान न्यायाधीश ने दलीलों पर गौर करते हुए सिब्बल की याचिका को सोमवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
यह याचिका ऐसे समय दायर की गई है, जब आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कुछ सांसदों ने दसवीं अनुसूची के तहत विलय के प्रावधानों का हवाला देते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों का दामन थामा है।
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सिम्मी माधव
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