उच्चतम न्यायालय ‘शांति’ अधिनियम के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई को सहमत
उच्चतम न्यायालय ‘शांति’ अधिनियम के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई को सहमत
नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को भारत में बदलाव के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (शांति)अधिनियम, 2025 के कई प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई।
शीर्ष अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि उठाया गया सवाल एक दिखने वाले वास्तविक एवं ठोस राष्ट्रीय हित और एक दुर्भाग्यपूर्ण काल्पनिक नुकसान के बीच है।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले को ‘‘अत्यंत संवेदनशील मुद्दा’’ बताते हुए विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता जताई और याचिकाकर्ताओं से अन्य देशों के तुलनात्मक नियामक तंत्र प्रस्तुत करने को कहा। पीठ ने कहा कि होली की छुट्टियों के बाद इस मामले की सुनवाई की जाएगी।
पूर्व नौकरशाह ईएएस शर्मा के नेतृत्व में प्राध्यापकों और वैज्ञानिकों सहित याचिकाकर्ताओं के एक समूह की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत में दलील दी कि 2025 का अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
उन्होंने अधिवक्ता नेहा राठी के साथ यह दलील दी कि 2010 के परमाणु दायित्व अधिनियम के स्थान पर लागू किए गए नागरिक दायित्व अधिनियम में निजी कंपनियों को असैन्य परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की अनुमति तो है, लेकिन उन्हें 3000 करोड़ रुपये से अधिक के दायित्व से छूट दी गई है, जबकि परमाणु दुर्घटनाओं में नुकसान दस लाख करोड़ रुपये से अधिक होता है, जैसा कि 1986 में चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र दुर्घटना और 2011 में जापान के फुकुशिमा परमाणु ऊर्जा संयंत्र दुर्घटना के मामले में हुआ था।
भूषण ने कहा कि यह अधिनियम 1987 में ओलियम गैस रिसाव (दिल्ली) मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा खतरनाक उद्योगों के लिए निर्धारित पूर्ण दायित्व के सिद्धांत के विरुद्ध है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘असली विवाद एक वास्तविक, प्रत्यक्ष और ठोस राष्ट्रीय हित और एक दुर्भाग्यपूर्ण काल्पनिक नुकसान के बीच है।’’
उन्होंने कहा कि भारत में पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों की कमी है और इन उद्योगों के विकास तथा पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘हम कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों की अनुमति नहीं देते, जंगलों से हम समझौता नहीं कर सकते, हमारे पास गैस नहीं है। हम कहां जा रहे हैं?’’
भूषण ने सुझाव दिया कि इसका उत्तर सौर ऊर्जा है क्योंकि परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की लागत सौर ऊर्जा के उत्पादन की लागत से चार गुना अधिक है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सौर ऊर्जा के लिए देश को लिथियम की आवश्यकता है, जिसके लिए भारत को चीन पर निर्भर रहना होगा।
भूषण ने जवाब दिया कि दुर्भाग्य से, इस देश में यह धारणा बन गई है कि देश में बिजली का उत्पादन बहुत कम है।
सीजेआई ने कहा कि समस्या यह है कि कई राज्यों ने अब बिजली पर सब्सिडी देना शुरू कर दिया है, जिससे निजी कंपनियों के हितों पर असर पड़ रहा है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है, लेकिन वह मामले के विवरण पर गौर करना चाहेगा।
भूषण के माध्यम से दाखिल याचिका में मौलिक अधिकारों को लागू करने का अनुरोध किया गया है और शांति अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों को निरस्त करने की गुहार लगाई गई है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि अधिनियम के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के साथ-साथ पूर्ण दायित्व के सिद्धांत, प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत, सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत, अंतर-पीढ़ीगत समानता के सिद्धांत, सतत विकास आदि का उल्लंघन करते हैं… जिन्हें इस न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना है।
याचिका में कहा गया, ‘‘हाल ही में लागू किए गए शांति अधिनियम, 2025 ने निजी क्षेत्र और विदेशी कंपनियों को भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की अनुमति तो दी है, लेकिन साथ ही इन कंपनियों की दुर्घटना की स्थिति में देनदारी को बेहद कम स्तर पर सीमित कर दिया है और आपूर्तिकर्ता को किसी भी देनदारी से छूट दे दी है।’’
भाषा धीरज माधव
माधव

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