उच्चतम न्यायालय ने दस्तावेजों के अनुवाद की खराब गुणवत्ता पर चिंता जताई
उच्चतम न्यायालय ने दस्तावेजों के अनुवाद की खराब गुणवत्ता पर चिंता जताई
नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कानूनी सहायता मामलों में अपील दाखिल करने के लिए दस्तावेजों के खराब अनुवाद पर बृहस्पतिवार को चिंता जताई और उच्च न्यायालयों को इस मुद्दे पर गंभीरता से गौर करने एवं चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कानूनी सहायता के संबंध में अपील दाखिल करने के लिए अभिलेखों के अनुवाद और प्रसारण को लेकर एसओपी को मंजूरी देते हुए यह निर्देश पारित किया।
पीठ ने कहा, ‘‘अनुवाद की खराब गुणवत्ता के बारे में हाल में कई मौकों पर इस न्यायालय ने जिक्र किया है, जो इस संबंध में किसी प्रकार के व्यवस्थागत बदलाव की आवश्यकता को दर्शाता है। संबंधित उच्च न्यायालय समयबद्ध अवधि के भीतर, यानी अधिकतम चार सप्ताह में मामले पर गंभीरतापूर्वक गौर कर निर्णय ले सकता है।’’
न्यायालय ने कहा कि यह मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) ‘‘इस क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों’ द्वारा किए गए गहन विचार-विमर्श का परिणाम है। ऐसे में, सभी उच्च न्यायालयों को इस पर विचार करना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘यह निर्देश दिया जाता है कि इस आदेश की एक प्रति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष आवश्यक विचार-विमर्श और उचित कार्रवाई के लिए रखी जाए।’’
न्यायालय ने कहा कि हालांकि एसओपी के संपूर्ण दायरे के कार्यान्वयन को उच्च न्यायालयों के विवेक पर छोड़ दिया गया है, लेकिन उल्लिखित समय-सीमा को बाध्यकारी माना जाएगा।
अदालत ने राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र समेत सभी संबंधित संस्थानों को 30 अप्रैल तक वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने कहा कि कानूनी सहायता इस विचार पर आधारित है कि कानून के समक्ष समानता वास्तविक होनी चाहिए, न कि प्रतीकात्मक।
शीर्ष अदालत ने कहा कि कानूनी सहायता यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि अधिकार केवल उन लोगों तक सीमित न रहें जो कानूनी प्रतिनिधित्व का खर्च उठा सकते हैं, बल्कि यह गरीबों और हाशिये पर रहने वाले लोगों सहित सभी के लिए उपलब्ध हो।
न्यायालय ने कहा, ‘‘कानूनी सुरक्षा को सार्थक बनाने में इसकी अहम भूमिका है। भारत में, कानूनी सहायता की अवधारणा संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त दृष्टिकोण से गहराई से जुड़ी हुई है, जो सामाजिक, आर्थिक और/या राजनीतिक न्याय के साथ-साथ स्थिति और अवसर की समानता का वादा करती है और राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की पुष्टि करती है।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस संदर्भ में सामाजिक न्याय के लिए ढांचागत असमानताओं को कम करने और कमजोर समूहों को बहिष्कार एवं शोषण से बचाने की आवश्यकता है।
भाषा आशीष सुरेश
सुरेश

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