उच्चतम न्यायालय ने ओडिशा के एक गांव में मिशन शक्ति भवन को गिराने का आदेश रद्द किया

उच्चतम न्यायालय ने ओडिशा के एक गांव में मिशन शक्ति भवन को गिराने का आदेश रद्द किया

उच्चतम न्यायालय ने ओडिशा के एक गांव में मिशन शक्ति भवन को गिराने का आदेश रद्द किया
Modified Date: February 18, 2026 / 07:03 pm IST
Published Date: February 18, 2026 7:03 pm IST

नयी दिल्ली, 18 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने ओडिशा के पुरी जिले के एक गांव में महिला स्वयं सहायता समूह की इमारत को ध्वस्त करने संबंधी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश को बुधवार को रद्द कर दिया।

एनजीटी ने इस इमारत को इस आधार पर गिराने का आदेश दिया था कि यह जलाशय क्षेत्र में बनी है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ गोपीनाथपुर ग्राम पंचायत समिति की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसमें ओडिशा उच्च न्यायालय के जुलाई 2022 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने ध्वस्तीकरण संबंधी एनजीटी फैसले के खिलाफ कोई आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय अधिकारियों को सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

पीठ ने कहा कि यह ढांचा राज्य सरकार की प्रमुख योजना मिशन शक्ति के तहत बनाया गया था, जिसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाना था।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘एनजीटी किसी सरकारी इमारत को गिराने का निर्देश कैसे दे सकता है?’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना एक चुनौती है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘आप इस तरह की याचिकाएं दायर करके इन सबको को रोकना चाहते हैं। वहां काफी तालाब हैं। अगर स्थानीय स्वयं सहायता समूह इस इमारत का उपयोग करते हैं, तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए…’’

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वकील ने बताया कि मामला एक जलधारा से संबंधित है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘मुझे पता है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कैसे काम करते हैं।’ पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में एनजीटी से विशेषज्ञ निकाय की मदद लेने की अपेक्षा की जाती है।

पीठ ने कहा कि जलधारा को जलाशय के रूप में गलत तरीके से वर्णित किया गया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता प्रदान करना एक संवैधानिक लक्ष्य है, और न्यायिक मंचों समेत सभी जगह इसकी रक्षा की जानी चाहिए।’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कार्रवाई तभी की जा सकती है जब ‘कानूनों का घोर उल्लंघन’ हुआ हो। उन्होंने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता उसी क्षेत्र का निवासी है और उसने भवन निर्माण के बाद कानूनी विवाद खड़ा करने का निर्णय लिया।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि यह कथित तौर पर एक जलधारा है, इसलिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सभी हितधारकों को विशेषज्ञों से परामर्श कर यह सुनिश्चित करना होगा कि इसके प्रवाह में कोई बाधा न हो। उन्होंने कहा कि इमारत को यथावत रखना होगा।

भाषा आशीष अविनाश

अविनाश


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