नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बिहार के दरभंगा शहर के तीन ऐतिहासिक एवं प्राचीन पोखर के संरक्षण का अनुरोध करने वाली एक याचिका पर सोमवार को राज्य सरकार से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई 4 मई के लिए निर्धारित की।
वकील कमलेश कुमार मिश्रा और उनके साथ मौजूद वकील रेनू ने अदालत को बताया कि दरभंगा जिले के तीन ऐतिहासिक पोखर (तालाब) गंगा सागर, दिग्घी और हराही को सरकारी एजेंसियों द्वारा सुनियोजित तरीके से भरा जा रहा है और उनका अतिक्रमण किया गया है।
उन्होंने कहा कि तालाबों को भरना राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी), उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के पूरी तरह विपरीत है।
गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) तालाब बचाओ अभियान द्वारा दायर याचिका में कहा गया है, ‘‘चूंकि सरकार इन आदेशों का उल्लंघन कर रही है और याचिकाकर्ता के पास कोई अन्य उपाय नहीं बचा है। इसलिए, वह तत्काल उपाय की मांग करने के लिए इस न्यायालय का रुख करने को विवश हुआ, ताकि तालाबों को और भरे जाने से रोका जा सके और दरभंगा के तीनों तालाबों पर और आसपास के सभी अतिक्रमणों को हटाया जा सके और उन्हें 1868 और 1960 के नक्शों में दर्शाए गए उनके मूल स्थान पर बहाल किया जा सके।’’
एनजीओ ने दावा किया है कि दरभंगा स्थित गंगा सागर, दिग्घी और हराही पोखर 800 से 900 साल पुराने ऐतिहासिक तालाब हैं, जिनका निर्माण क्रमशः राजा गंग सिंह देव (1136-1148 ईस्वी), शक्र सिंह देव (1288-1303) और हरि सिंह देव (1304-1324) द्वारा कराया गया था।
एनजीओ ने दलील दी कि ये पोखर न केवल दरभंगा के लिए, बल्कि पूरे बिहार राज्य के लिए अनमोल, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत हैं तथा उसकी याचिका में तालाबों के संबंध में राज्य की नीति को भी शामिल किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता को इस अदालत में आने का जो कारण है, वह राज्य की एजेंसियों, विशेष रूप से बीयूआईडीसीओ (बिहार शहरी अवसंरचना विकास निगम) द्वारा हाल ही में तालाबों को भरे जाने का कृत्य है।
इसमें कहा गया है, ‘‘इस कृत्य ने इलाके के स्थानीय समुदाय की अंतरात्मा को झकझोर दिया, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन किया है, अपनी बात रखी है और इस संबंध में खबरें भी प्रकाशित हुई हैं। हालांकि, (तालाबों में) मिट्टी भरने का काम जारी है। इसे अगर नहीं रोका गया, तो तालाब हमेशा के लिए पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे।’’
इसमें कहा गया है कि तालाबों को भरने का यह कृत्य पूरी तरह से अवैध और मनमाना है, क्योंकि एनजीओ ने इन जलाशयों के संरक्षण और बचाव के लिए एनजीटी के समक्ष याचिका दायर की थी। साथ ही, इनके संरक्षण और बचाव के लिए कुछ आदेश पारित किए गए हैं और इन आदेशों का क्रियान्वयन हरित अधिकरण के समक्ष लंबित है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘पटना उच्च न्यायालय द्वारा भी तालाबों के संरक्षण के लिए आदेश पारित किए गए हैं। हालांकि, इस तथ्य को देखते हुए कि उच्च न्यायालय में याचिका की सुनवाई में काफी समय लगता है और कोलकाता स्थित एनजीटी के पास मामलों की सुनवाई के लिए कोई नियमित पीठ नहीं है तथा तालाबों को जोर-शोर से खत्म किया जा रहा है, याचिकाकर्ता ने इनके संरक्षण के लिए इस न्यायालय में याचिका दायर की है।’’
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप