शीर्ष अदालत ने न्यायिक अधिकारी के आचरण को ‘घृणित’ बताया, उच्च न्यायालय के आदेश पर लगाई रोक

शीर्ष अदालत ने न्यायिक अधिकारी के आचरण को ‘घृणित’ बताया, उच्च न्यायालय के आदेश पर लगाई रोक

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  • Publish Date - January 12, 2026 / 06:37 PM IST,
    Updated On - January 12, 2026 / 06:37 PM IST

नयी दिल्ली, 12 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें 2018 में ट्रेन में एक महिला सहयात्री की बर्थ के सामने पेशाब करने और उपद्रव मचाने के आरोप में एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दीवानी न्यायाधीश के इस आचरण को ‘घृणित’ बताते हुए कहा कि यह एक ‘चौंकाने वाला’ मामला था और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था।

उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक अधिकारी और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करके पिछले साल मई में उच्च न्यायालय की खंडपीठ के एक आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष द्वारा दायर की गई याचिका पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी है। खंडपीठ ने अपने आदेश में सितंबर 2019 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया था और न्यायिक अधिकारी को 15 दिनों के भीतर बहाल करने का निर्देश दिया था।

उच्चतम न्यायालय की पीठ ने कहा, ‘‘आपको बर्खास्त किया जाना चाहिए था।’’ शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘‘नोटिस जारी करें, जिसका जवाब चार सप्ताह के भीतर देना होगा। इस बीच, विवादित फैसले का प्रभाव और क्रियान्वयन स्थगित रहेगा।’’ मामले की सुनवाई छह सप्ताह बाद के लिए स्थगित कर दी गई है।

न्यायिक अधिकारी को मार्च 2011 में द्वितीय श्रेणी के दीवानी न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया था। आरोप है कि जून 2018 में, जब वह ट्रेन में यात्रा कर रहे थे, तो उन्होंने नशे की हालत में सहयात्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया, उन्हें परेशान किया और कुछ अश्लील हरकतें कीं।

यह भी आरोप लगाया गया कि नशे की हालत में आरोपी ने एक महिला सहयात्री के बर्थ के सामने पेशाब किया, जिससे असुविधा हुई और यात्रियों को चेन खींचनी पड़ी, जिसके कारण ट्रेन सेवा में विलंब हुआ।

इस घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और चूंकि अपराध जमानती था, इसलिए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।

आरोपी ने अपना जवाब दाखिल किया और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया।

अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि जांच अधिकारी ने न्यायिक अधिकारी को उन पर लगे आरोपों का दोषी पाया है।

बाद में, प्रशासनिक समिति ने सेवा से बर्खास्तगी की सजा का प्रस्ताव रखा और सितंबर 2019 में उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने इसे मंजूरी दे दी।

पूर्ण पीठ की सिफारिश के अनुपालन में, 28 सितंबर, 2019 के एक आदेश द्वारा उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

इसके बाद उन्होंने 28 सितंबर, 2019 के आदेश और प्रशासनिक समिति की सिफारिश के साथ-साथ पूर्ण पीठ के निर्णय को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।

उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह गौर किया था कि विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट ने उन्हें बरी कर दिया था और यह दर्ज किया था कि शराब के सेवन की पुष्टि करने वाला कोई चिकित्सकीय साक्ष्य रिकॉर्ड में मौजूद नहीं था। इसके बाद उच्च न्यायालय ने उनकी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई।

भाषा संतोष दिलीप

दिलीप