नीट प्रदर्शन मामले में न्यायालय ने बेदाग रिकॉर्ड वाले लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई

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नीट प्रदर्शन मामले में न्यायालय ने बेदाग रिकॉर्ड वाले लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई

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  • Publish Date - July 28, 2026 / 07:50 PM IST,
    Updated On - July 28, 2026 / 07:50 PM IST

नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को राज्यों को हाल ही में हुए छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक दिया और निर्देश दिया कि 18 वर्ष से कम आयु के उन लोगों को रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक इतिहास न हो।

शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि वह जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर सकता है।

चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र लीक होने को लेकर देशभर में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि इस मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत है।

पीठ ने निर्देश दिया, ‘‘सभी राज्यों को निर्देश दिया जाता है कि वे 18 साल से कम उम्र के उन बच्चों को रिहा करें, जिन्हें हालिया विरोध-प्रदर्शनों के सिलसिले में गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है और जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।’’

न्यायालय ने कहा कि अगर जरूरी हो, तो इन बच्चों को उनके या उनके परिवार के सदस्यों के एक साधारण मुचलके पर रिहा किया जा सकता है, खासकर तब जब जमानत के लिए ऐसी शर्त रखी जाए।

पीठ ने कहा, ‘‘जिस किसी ने भी ज्यादती की है या कानून को अपने हाथ में लिया है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।’’

शीर्ष अदालत ने पैलेट गन, कील लगी लाठियों और ‘इलेक्ट्रिक बैटन’ के इस्तेमाल जैसे आरोपों पर संज्ञान लिया, जिनकी वजह से कई छात्रों और युवतियों को गंभीर और जानलेवा चोटें आईं।

पीठ ने निर्देश दिया कि दिल्ली सरकार और अन्य राज्य सरकारें मामलों में दर्ज प्राथमिकी पर आगे की जांच जारी रख सकती हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

पीठ ने प्रदर्शनकारी छात्रों को दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा देने के साथ ही स्पष्ट किया कि उसका यह निर्देश उन लोगों पर लागू नहीं होगा, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है।

पीठ ने कहा कि वह एक कार्यबल के जरिए सभी आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और गहन जांच कराने पर विचार कर रही है। पीठ ने कहा कि इस बात का पता लगाने के लिए भी जांच की जरूरत है कि 250 पुलिसकर्मियों पर हुए हमले छात्रों ने किये थे या कुछ ‘उपद्रवियों’ ने।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘ कुछ भी कहें, याचिकाकर्ताओं के आरोपों से पहली नजर में हिंसा की घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का एक मजबूत मामला बनता है। ऐसी जांच से पुलिसकर्मियों के परिवारों के आरोपों और सॉलिसीटर जनरल द्वारा उठाए गए मुद्दों, दोनों का ही उचित समाधान हो सकेगा।’’

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई तीन अगस्त को सूचीबद्ध करते हुए कहा कि न्याय के हित में वह केंद्र और संबंधित राज्यों को स्वतंत्र समिति या विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन पर विचार करने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर दे रही है।

शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल को नोटिस जारी किए और उनके महाधिवक्ता से सुनवाई की अगली तारीख पर ऑनलाइन पेश होने का निर्देश दिया।

पीठ ने उन राज्यों को कई अंतरिम निर्देश जारी किए, जहां विरोध प्रदर्शन हुए थे, ताकि प्रदर्शनों से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड, पीसीआर प्रविष्टियां और अन्य डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखा जा सके।

न्यायालय ने निर्देश दिया, ‘‘हालांकि सॉलिसीटर जनरल ने निर्देश मिलने पर अदालत में यह बात पहले ही कह दी है, फिर भी एहतियात के तौर पर हम भी यह निर्देश देते हैं कि छात्रों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-वर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, वीडियोग्राफी, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और पीसीआर प्रविष्टियों से संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं।’’

पीठ ने पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया कि छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान एकत्र प्रदर्शनकारियों की निजी जानकारी और डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखा जाए और फिलहाल उन्हें सार्वजनिक न किया जाए।

पीठ ने रेखांकित किया कि अधिकारी प्रदर्शनकारियों, विशेषकर छात्रों, का कोई भी सार्वजनिक डेटा या विवरण प्रकाशित नहीं करें।

आदेश में कहा गया, ‘‘ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और दूसरे राज्य दर्ज प्राथमिकी की जांच आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन, विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। फिर भी, यह सुरक्षा उन लोगों को नहीं मिलेगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘प्रथम दृष्टया इन आरोपों पर निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए, जिसमें घायल हुए 200 से अधिक पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंताओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।’’

न्यायालय ने कहा कि ‘‘निर्धारित प्रोटोकॉल’’ का उल्लंघन होने पर कानून अपना काम करेगा। शीर्ष अदालत ने साथ ही कहा कि वह एसआईटी की संरचना के बारे में बाद में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करेगा।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अब समय आ गया है कि अदालतों द्वारा समय-समय पर तय किए गए सभी कानूनी सिद्धांतों को एक साथ लाया जाए और विरोध-प्रदर्शनों की स्थिति को अब एक जैसे मापदंडों के तहत नियंत्रित किया जाए।

पीठ ने पीड़ितों के वकीलों की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए कहा कि विरोध कर रहे नीट छात्रों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। उसने कहा, ‘‘जब तय प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, तो कानून को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।’’

केंद्र और दिल्ली सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि छात्र पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा में शामिल नहीं होंगे, लेकिन कुछ ‘उपद्रवी तत्व’ हिंसक घटनाओं में शामिल थे।

कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के आह्वान पर 20 जुलाई को दिल्ली में ‘चलो संसद’ मार्च निकाला गया था और इस दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं। सुरक्षाकर्मियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियों और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया।

प्रदर्शनकारी नीट प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारी छात्रों ने शनिवार को प्रधान के इस्तीफे, नीट की वजह से जान देने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं करने की मांगों पर सरकार के साथ बनी सहमति के बाद अपना आंदोलन वापस ले लिया।

भाषा धीरज नरेश

नरेश