कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए राज्यों को भारी मुआवजा देने का निर्देश देंगे : उच्चतम न्यायालय

कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए राज्यों को भारी मुआवजा देने का निर्देश देंगे : उच्चतम न्यायालय

कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए राज्यों को भारी मुआवजा देने का निर्देश देंगे : उच्चतम न्यायालय
Modified Date: January 13, 2026 / 07:16 pm IST
Published Date: January 13, 2026 7:16 pm IST

नयी दिल्ली, 13 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने पिछले पांच वर्षों में आवारा पशुओं से संबंधित नियमों के क्रियान्वयन के लिए कोई कदम नहीं उठाए जाने पर मंगलवार को चिंता व्यक्त की और कहा कि वह कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए राज्यों को ‘‘भारी मुआवजा’’ देने का आदेश देगा।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए कुत्ता प्रेमियों और उन्हें खाना देने वालों को भी ‘जिम्मेदार’ और ‘जवाबदेह’ ठहराया जाएगा।

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मृत्यु या चोट के हर मामले के लिए हम राज्य सरकारों से भारी मुआवजा देने को कहेंगे क्योंकि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में नियमों के कार्यान्वयन के संबंध में कुछ नहीं किया है। साथ ही, इन आवारा कुत्तों को खाना देने वालों की भी जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की जाएगी। अगर आपको इन जानवरों से इतना प्यार है तो आप उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? ये कुत्ते इधर-उधर क्यों घूमते हैं? लोगों को काटते हैं और डराते हैं।’’

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न्यायमूर्ति मेहता ने न्यायमूर्ति नाथ के विचारों से सहमति जताते हुए कहा, ‘‘जब कुत्ते नौ साल के बच्चे पर हमला करते हैं तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? वह संगठन जो उन्हें खाना दे रहा है, उसे? आप चाहते हैं कि हम इस समस्या से आंखें मूंद लें।’’

उच्चतम न्यालय सात नवंबर, 2025 के अपने उस आदेश में संशोधन के अनुरोध वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें अधिकारियों को सार्वजनिक स्थानों और सड़कों से इन आवारा जानवरों को हटाने का निर्देश दिया गया था।

न्यायालय ने कहा कि सबसे अजीब बात यह है कि गुजरात के एक वकील को एक पार्क में कुत्ते ने काट लिया और जब नगर निगम के अधिकारी उस जानवर को पकड़ने गए, तो खुद को कुत्ता प्रेमी बताने वाले वकीलों ने नगर निगम के अधिकारियों पर हमला कर दिया।

न्यायालय ने इस पर भी अफसोस जताया कि पिछले चार दिन से वह इस मुद्दे पर दलीलें सुन रहा है, लेकिन कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के हस्तक्षेप के कारण वह मामलों में आगे नहीं बढ़ पाया और केंद्र तथा राज्य सरकारों के पक्ष को भी नहीं सुन सका।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हम सभी वकीलों से अनुरोध करते हैं कि वे हमें केंद्र, राज्य सरकारों और अन्य संबंधित निकायों की जवाबदेही तय करने दें… हमें आदेश पारित करने दें। हमें राज्यों और केंद्र के साथ आधा दिन बिताने की जरूरत है, ताकि यह देखा जा सके कि उनके पास कोई कार्ययोजना है या नहीं। समस्या हजार गुना बढ़ चुकी है। हम सिर्फ वैधानिक प्रावधानों के क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। हमें यह करने दें। हमें काम करने दें। हमें आगे बढ़ने दें।’’

सुनवाई की शुरुआत में एक एनजीओ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने संस्थागत क्षेत्रों से संबंधित उच्चतम न्यायालय के सात नवंबर, 2025 के आदेश का बचाव करते हुए तर्क दिया कि यह पूरी तरह से न्यायसंगत और वैधानिक नियमों के अनुरूप था। उन्होंने कहा कि चूंकि मौजूदा समितियों की रिपोर्ट पहले से ही रिकॉर्ड में मौजूद हैं, इसलिए किसी नयी विशेषज्ञ समिति के गठन की कोई आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि दातार आदेश के पक्ष में आगे आने वाले पहले व्यक्ति हैं।

पशु कल्याण ट्रस्ट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से आग्रह किया कि वह इस मामले को केवल मानव बनाम पशु के मुद्दे के रूप में नहीं बल्कि पारिस्थितिक संतुलन के परिप्रेक्ष्य से देखे।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, ‘एक युवा वकील ने अभी-अभी हमें सड़कों पर रहने वाले अनाथ बच्चों के आंकड़े दिखाए। शायद कुछ वकील उन बच्चों को गोद लेने की वकालत कर सकते हैं। 2011 में न्यायाधीश बनने के बाद से मैंने इतनी लंबी बहसें नहीं सुनी हैं। और अब तक किसी ने भी इंसानों के लिए इतनी लंबी बहस नहीं की है।’

वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के तहत जानवरों के साथ दया और संवेदनशील व्यवहार करना आवश्यक है, और उन्होंने उन तरीकों के खिलाफ चेतावनी दी जो जानवरों को मारने के समान हैं।

इसी प्रकार, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और अन्य वकीलों ने भी इस मुद्दे पर तर्क प्रस्तुत किए।

शीर्ष अदालत ने नौ जनवरी को कहा था कि वह कुत्तों को खाना देने वाली महिलाओं और उनकी देखभाल करने वाली महिलाओं के उत्पीड़न के आरोपों पर विचार नहीं करेगी, क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का मुद्दा है और पीड़ित व्यक्ति इसके बारे में प्राथमिकी दर्ज करा सकते हैं।

न्यायालय ने इस मुद्दे पर महिलाओं के बारे में की गई कुछ अपमानजनक टिप्पणियों से संबंधित दावों पर भी विचार करने से इनकार कर दिया।

भाषा आशीष नरेश

नरेश


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