शीर्ष अदालत ‘उद्योग’ की परिभाषा से संबंधित 1978 के फैसले के औचित्य की करेगी समीक्षा

शीर्ष अदालत 'उद्योग' की परिभाषा से संबंधित 1978 के फैसले के औचित्य की करेगी समीक्षा

शीर्ष अदालत ‘उद्योग’ की परिभाषा से संबंधित 1978 के फैसले के औचित्य की करेगी समीक्षा
Modified Date: March 17, 2026 / 10:20 pm IST
Published Date: March 17, 2026 10:20 pm IST

नयी दिल्ली, 17 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने मंगलवार को कहा कि वह वह 1978 के उस फैसले की कानूनी यथार्थता की जांच करेगा जिसमें श्रम संबंधों को नियंत्रित करने के लिए ‘‘उद्योग’’ शब्द की विस्तृत व्याख्या दी गई थी।

सात-सदस्यीय संविधान पीठ ने बेंगलुरु जलापूर्ति एवं मलजल शोधन बोर्ड की याचिका पर विचार करते हुए 21 फरवरी, 1978 को ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा पर फैसला सुनाया था।

वर्ष 1978 के इस फैसले ने “उद्योग” की व्याख्या को इतना व्यापक कर दिया कि इसका दायरा केवल कारखानों के कर्मचारी तक सीमित न रहकर, कई अन्य क्षेत्र जैसे अस्पताल, स्कूल, क्लब और सरकारी कल्याण विभाग के कर्मचारियों तक व्यापक हो गया था और वे भी औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत अपनी श्रमिक सुरक्षा और अधिकारों का लाभ लेने के पात्र हो गए।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने ‘उद्योग’ की दशकों पुरानी परिभाषा के कानूनी वैधता के निर्धारण संबंधी विभिन्न याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई शुरू की।

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल हैं।

न्यायालय ने 16 फरवरी को नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा विचार किए जाने वाले व्यापक मुद्दों को निर्धारित किया था।

प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि पीठ 1982 के कानून में उल्लेखित “उद्योग” शब्द की परिभाषा पर विचार नहीं करेगी, क्योंकि वह कानून “कभी लागू हुआ ही नहीं” और इसलिए उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि पीठ औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में परिभाषित शब्द पर भी विचार नहीं करेगी, जो 2025 में लागू हुआ, क्योंकि इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

आज सुनवाई के दौरान शुरुआती दलील में एटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि क्या “अत्यधिक व्यापक” परिभाषा ने “अत्यधिक मुकदमेबाज़ी” को जन्म दिया है और क्या इसने सरकार के संप्रभु और कल्याणकारी कार्यों को अन्यायपूर्ण रूप से “औद्योगिक” श्रेणी में रखा है।

शीर्ष विधि अधिकारी ने कहा कि यद्यपि तिहरी जांच “सिद्धांतत: सही” है, लेकिन इसका “बेतरतीब लागू होना” उन गतिविधियों को अत्यधिक शामिल करने का कारण बनता है जो व्यापार या व्यवसाय जैसी नहीं हैं।

न्यायमूर्ति नगरत्ना ने कहा कि 1978 का फैसला सत्तर के दशक के सामाजिकतावादी युग का उत्पाद था। उन्होंने कहा, ‘‘हम अब 2026 में हैं। हमें ‘एलपीजी’ (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) के कई साल हो चुके हैं।’’

पीठ ने पहले कहा था, ‘‘हमारी सुविचारित राय में, हमें निम्नलिखित मुद्दों का निर्णय करना है: यह निर्धारित करने के लिए कि कोई उद्यम ‘उद्योग’ की परिभाषा में आता है, क्या बेंगलुरु जलापूर्ति मामले में न्यायमूर्ति वी. कृष्ण अय्यर द्वारा पैराग्राफ 140 से 144 में निर्धारित परीक्षण को वैध माना जाए?’’

उसने कहा था, ‘‘क्या औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 प्रभावी रूप से लागू नहीं हुआ था और क्या उद्योग संहिता ने ‘उद्योग’ शब्द पर कोई कानूनी प्रभाव डाला?’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह इस बात पर भी विचार करेगा कि क्या सरकारी विभागों या संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही सामाजिक कल्याणकारी गतिविधियों या योजनाओं को औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत औद्योगिक गतिविधियां माना जा सकता है।

वर्ष 2017 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि इस मुद्दे के ‘‘गंभीर और व्यापक प्रभावों’’ को ध्यान में रखते हुए उसके समक्ष दायर अपीलों को नौ-सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए।

मई 2005 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(जे) में ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा की व्याख्या के संबंध में मामले को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया था।

पीठ ने कहा था कि वृहद पीठ को सभी कानूनी प्रश्नों की पड़ताल सभी दृष्टिकोणों और गहराई से करनी होगी।

भाषा सुरेश रंजन

रंजन


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