नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) अभिनेता-गायक दिलजीत दोसांझ ने कहा है कि उनकी फिल्म ‘सतलुज’ पर रोक लगनी तय थी और उन्हें पहले से ही इसका अंदाजा था।
दिलजीत ने कहा कि लेकिन उन्होंने सोचा था कि यह फैसला सोमवार को दफ्तर खुलने के बाद होगा, लेकिन फिल्म को रविवार शाम ही ओटीटी मंच से हटा दिया गया।
हनी त्रेहन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दिलजीत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है जिनका 1995 में कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया था और उसके बाद उनका कभी कोई पता नहीं चला।
‘पंजाब 1995’ शीर्षक से बनी यह फिल्म तीन वर्ष से अधिक समय तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रही। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म के 127 दृश्यों में काट-छांट का सुझाव दिया था लेकिन निर्देशक और दिलजीत ने इसके बिना ही फिल्म को रिलीज किया।
इस समय अमेरिका की यात्रा कर रहे दिलजीत ने सोमवार को ‘इंस्टाग्राम लाइव’ के दौरान कहा, ‘‘आज यहां रविवार है, लेकिन लगता है भारत में सोमवार है। मेरे यहां रविवार शाम है। शुक्रवार को ही मुझे आभास हो गया था कि कुछ ऐसा होने वाला है।…इस पर हैरानी की कोई बात नहीं है। मुझे लगा था कि सोमवार को दफ्तर खुलने के बाद फिल्म पर रोक लगेगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन मुझे यह अंदाजा नहीं था कि ऐसा रविवार शाम को ही हो जाएगा। हमने फिल्म का कोई प्रचार भी नहीं किया, बस शांत तरीके से रिलीज कर दिया। अगर इसका प्रचार किया होता, तो शायद यह दो दिन भी नहीं चल पाती। फिर भी मुझे संतोष है कि लोगों ने फिल्म देखी और यह उन तक पहुंच गई।’’
‘जी5’ की ओर से रविवार शाम दर्शकों को सूचित किया गया कि यह फिल्म भारत में उपलब्ध नहीं है।
दिलजीत ने कहा कि उन्हें खुशी है कि बड़ी संख्या में लोग फिल्म देख चुके हैं या उसे डाउनलोड कर चुके हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘आज की युवा पीढ़ी इस फिल्म की बात कर रही है। मैंने एक बहुत अच्छा वीडियो देखा, जिसमें संभवतः राजस्थान के किसी गुरुद्वारे में यह फिल्म दिखाई जा रही थी। मुझे संतोष है कि यह फिल्म आप तक पहुंच गई।’’
इन दिनों दिलजीत अक्सर ‘इंस्टाग्राम लाइव’ के जरिए ही अपने प्रशंसकों से संवाद करते हैं।
उन्होंने कहा कि फिल्म की पूरी टीम की मेहनत लोगों तक पहुंच चुकी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ‘सतलुज’ को साझा करें और जिस तरह संभव हो, उसे देखें।
दिलजीत ने कहा, ‘‘सबसे जरूरी बात यह थी कि फिल्म आप तक पहुंचे और ऐसा हो चुका है। मैं इस बात के लिए आभारी हूं कि जो संदेश हम देना चाहते थे और जिस तरीके से देना चाहते थे, वह लोगों तक पहुंच गया। यह आपकी फिल्म है और आप इसे जिस तरह चाहें, देख सकते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘फिल्म को रिलीज करने का यही एकमात्र तरीका था… बिना कुछ कहे, क्योंकि जो हुआ, वह होना तय था।’’
दिलजीत ने कहा कि इस फिल्म का नाम ‘पंजाब 1995’ से बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया और इस फिल्म को जितना रोकने की कोशिश की जाएगी, यह उतनी ही अधिक लोकप्रिय होगी।
उन्होंने कहा कि इंटरनेट से कुछ भी पूरी तरह गायब नहीं होता, यहां तक कि ‘व्हॉट्सऐप’ का एक ‘वॉयस नोट’ भी नहीं।
फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के मामलों की पड़ताल की थी। वर्ष 1995 में वह रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए थे।
वर्ष 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को उनके अपहरण और हत्या का दोषी ठहराते हुए सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी। दो वर्ष बाद पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी सजा बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी।
भाषा खारी नरेश
नरेश