नयी दिल्ली, एक जून (भाषा) अस्थायी और नियमित कर्मचारियों के भत्तों और सेवानिवृत्ति लाभों में भारी असमानता का संज्ञान लेते हुए, उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि राज्य एक नियोक्ता के रूप में ऐसे कार्यबल को बनाए नहीं रख सकता जो स्थायी कर्मचारियों के समान काम करता है लेकिन उसे समान लाभों से वंचित रखा जाता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों से सेवा कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने से इनकार कर दिया गया था।
न्यायालय ने ऐसे किसी भी वर्गीकरण को संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन बताया जिसके परिणामस्वरूप कर्मचारियों के एक वर्ग को, किसी भी लाभ से वंचित किया जाता है जबकि वे अन्य वर्ग के समान ही काम कर रहे हो।
पीठ ने कहा कि इस अदालत ने एक सुसंगत न्यायिक दृष्टिकोण अपनाया है कि लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों, चाहे वे आकस्मिक हों या अस्थायी, विशेष रूप से जिन्हें मान्यता प्राप्त दर्जा दिया गया है, उन्हें सामाजिक सुरक्षा और पेंशन लाभ सहित संबंधित लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है।
उसने कहा, “इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि राज्य ऐसे कर्मचारियों को अनिश्चित स्थिति में न रखे, जबकि उनसे नियमित कर्मचारियों के समान सेवाएं ली जा रही हों।”
पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह डाक विभाग के तहत आकस्मिक श्रमिकों (नाइट गार्ड) के रूप में लंबे वर्षों तक सेवा देने वाले पूर्व कर्मचारियों या कर्मचारियों के कानूनी प्रतिनिधियों के एक समूह को देय पेंशन और परिणामी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना करे और उन्हें तीन महीने के भीतर जारी करे।
इसमें कहा गया है कि चूक की स्थिति में, उपार्जन की तिथि से लेकर संवितरण तक की अवधि के लिए ऐसे व्यक्तियों को प्रति वर्ष छह प्रतिशत की दर से ब्याज देय होगा।
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प्रशांत माधव
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