बेंगलुरु, दो अगस्त (भाषा) टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने रविवार को भारत के सबसे बड़े परमार्थ संगठन के लिए संस्थान-निर्माण का एक नया खाका पेश किया।
उन्होंने कहा कि टाटा ट्रस्ट गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ)और व्यक्तिगत विकास परियोजनाओं का वित्तपोषण करने की अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर ऐसे संस्थान का स्वरूप देने के लिए काम कर रहा है जो पीढ़ियों तक सेवा कर सकें।
नोएल टाटा ने कहा कि यह उस विरासत को फिर से जीवित कर रहा है जिसने भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी),टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर)और टाटा मेमोरियल अस्पताल जैसे संस्थान बनाए थे।
टाटा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, बैंगलोर द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक नोएल टाटा ने इस संस्थान के विशेष पुरा छात्र नेतृत्व संगोष्ठी ‘आईआईएमबीयूई 2026’ को संबोधित करते हुए यह बात कही।
बयान में कहा गया है कि इस रणनीति के तहत, असम सरकार के साथ मिलकर राज्य में 17 कैंसर देखभाल अस्पताल बनाने के बाद, टाटा ने पूरे भारत में 40-50 गैर लाभकारी जनरल हॉस्पिटल बनाकर सस्ती स्वास्थ्य सेवा सुविधाएं बढ़ाने की योजना की घोषणा की।
बयान में नोएल टाटा के हवाले से कहा गया है कि प्रस्तावित अस्पताल ‘क्रॉस-सब्सिडी मॉडल’ पर काम करेंगे, जिसमें खर्च वहन कर सकने वाले मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के इलाज के लिए संसाधन जुटाने में मदद करेंगे, और इससे चिकित्सकों, दवाओं या चिकित्सा सुविधाओं की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
टाटा ने कहा कि शिक्षा टाटा ट्रस्ट के अगले चरण का दूसरा मुख्य स्तंभ होगी।
टाटा ने भारतीय प्रबंधन संस्थान बेंगलुरु की साझेदारी में स्थापित किए जा रहे प्रस्तावित स्नातक संस्थान को एक अहम शुरुआत बताते हुए कहा कि भारत को ऐसे और भी कई विश्स्तरीय शिक्षण संस्थानों की तत्काल आवश्यकता है।
उन्होंने अफसोस जताया कि देश में अच्छी गुणवत्ता वाले संस्थानों की सीमित उपलब्धता के कारण हर साल हजारों प्रतिभाशाली भारतीय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने को मजबूर होना पड़ता है।
टाटा ने कहा, ‘‘ऐसा कोई कारण नहीं है कि भारत अच्छी गुणवत्ता वाले संस्थान न बना सके जिससे कि छात्र केवल सीट की कमी की वजह से देश छोड़कर जाने के बजाय यहीं पढ़ाई कर सकें।’’
टाटा ने उच्च शिक्षा में अधिक निवेश को आकर्षित करने के लिए सुधारों की भी वकालत की। उन्होंने दलील दी कि मुनाफ़ा कमाने वाले शिक्षण संस्थानों पर लगी पाबंदियों की वजह से निजी पूंजीपति इस क्षेत्र में निवेश करने से हिचकिचाता रहा है।
हार्वर्ड समेत दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे भारतीय मूल के शिक्षकों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में शैक्षणिक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए ज़रूरी संस्थागत बुनियादी ढांचा नहीं है।
टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन ने परमार्थ के काम में ज़्यादा जवाबदेही की भी मांग की और कहा कि सामाजिक संगठनों को असर के बारे में केवल बड़े-बड़े दावे करने से आगे बढ़ना चाहिए।
भाषा धीरज नरेश
नरेश