आजादी से कुछ दिन पहले रखी गई थी डूसू की नींव, देश के प्रमुख छात्र संगठनों में हुआ शामिल
आजादी से कुछ दिन पहले रखी गई थी डूसू की नींव, देश के प्रमुख छात्र संगठनों में हुआ शामिल
(अहेली दास)
नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) भारत की आजादी से कुछ ही दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए एक प्रतिनिधि निकाय गठित करने का विचार सामने आया था, जिसने आगे चलकर देश के प्रमुख छात्र प्रतिनिधि मंचों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) की नींव रखी।
डूसू की शुरुआत छह अगस्त, 1947 को मानी जाती है। इसी दिन विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की बैठक में छात्रों के एक प्रतिनिधि निकाय की ओर से विश्वविद्यालय छात्र संघ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया था। यह वह समय था जब भारत 15 अगस्त को स्वतंत्रता हासिल करने की तैयारी कर रहा था।
विश्वविद्यालय के आधिकारिक दस्तावेज में छह अगस्त, 1947 की कार्यकारी परिषद की बैठक के कार्यवृत्त का हवाला देते हुए कहा गया है कि कुलपति ने परिषद को सूचित किया था कि छात्रों का एक प्रतिनिधि निकाय विश्वविद्यालय छात्र संघ स्थापित करना चाहता है।
इस वर्ष डूसू का चुनाव 18 सितंबर को निर्धारित है और पिछले कई दशकों में छात्र संघ का विकास दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति तथा छात्र प्रतिनिधित्व के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।
आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, छात्र संघ के लिए आवश्यक संविधान और कार्यप्रणाली तैयार करने के लिए एक समिति गठित की जानी थी। साथ ही, कुलपति ने उम्मीद जताई थी कि औपचारिक रूप से गठित होने के बाद छात्र संघ को शुरुआती खर्च के लिए 150 रुपये की छोटी अनुदान राशि देने पर परिषद सहमत होगी।
यह प्रस्ताव आगे चलकर ऐसे संस्थागत सफर की शुरुआत बना, जिसने डूसू को दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकांश कॉलेजों और संकायों के छात्रों का प्रतिनिधि निकाय बना दिया। समय के साथ डूसू विश्वविद्यालय के छात्र जीवन और राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
हालांकि, शुरुआती वर्षों में छात्र संघ के कामकाज और उसके वित्तपोषण को लेकर कई सवाल सामने आए थे।
विश्वविद्यालय की कार्यकारी समिति ने 27 मार्च, 1953 को विश्वविद्यालय छात्र संघ की ओर से सहायता अनुदान के लिए दिए गए आवेदन पर विचार किया। विश्वविद्यालय ने कहा था कि छात्र संघ को आत्मनिर्भर बनने के प्रयास करने चाहिए और यह भी उल्लेख किया था कि उस वर्ष उसे पहले ही 500 रुपये दिए जा चुके हैं।
अगले वर्ष छात्र संघ की वित्तीय कठिनाइयां और स्पष्ट हुईं। विश्वविद्यालय ने 14 मार्च, 1954 को दर्ज किया कि छात्र संघ ने 1,995 रुपये खर्च किए थे, जबकि उसकी आय केवल 815 रुपये थी।
इसी बैठक में कुलपति ने यह भी उल्लेख किया था कि डूसू को संविधान प्रदान किया जा चुका है और पहली बार चुनाव कराए गए हैं।
कुलपति ने अगले शैक्षणिक वर्ष तक संघ का संचालन एक कार्यवाहक समिति के माध्यम से करने का प्रस्ताव रखा था। साथ ही, अगस्त 1954 तक नए खर्च पर रोक लगाने की बात कही गई थी।
पहले से किए गए खर्च को पूरा करने के लिए 1,100 रुपये तक का अनुदान देने का भी प्रस्ताव था। इसके लिए छात्र संघ के कोषाध्यक्ष डॉ. बी. एन. गांगुली से बिलों का अनुमोदन कराया जाना था।
उस दौर के विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड बताते हैं कि छात्र संघ को संस्थागत आधार देने की प्रक्रिया में वित्तीय जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे मुद्दे शुरुआती दौर से ही महत्वपूर्ण रहे।
करीब दो दशक बाद, दो अगस्त, 1973 को डूसू के संवैधानिक ढांचे में एक और महत्वपूर्ण बदलाव पर विचार किया गया। कार्यकारी परिषद ने डूसू के मौजूदा संविधान को समाप्त करने और एक अंतरिम संविधान लागू करने के प्रस्ताव पर विचार किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि अंतरिम संविधान में वित्तीय नियंत्रण के प्रावधान भी शामिल थे। इसके तहत 100 रुपये से अधिक के खर्च के लिए संघ की कार्यकारी समिति से आवश्यक मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया था।
डूसू के विकास का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू उसका सदस्यता शुल्क रहा है। छात्रों से 2012-13 तक डूसू के लिए पांच रुपये का शुल्क लिया जाता था। इसे 2013-14 में बढ़ाकर 20 रुपये किया गया और बाद में 21 जून, 2024 को इसे बढ़ाकर 40 रुपये कर दिया गया।
वर्ष 1973 के अंतरिम संविधान में डूसू की विस्तृत प्रशासनिक संरचना भी निर्धारित की गई थी।
इसके तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति को डूसू का संरक्षक बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना थी कि छात्र संघ संविधान के अनुरूप काम करे। संरचना में एक स्टाफ सलाहकार और एक कोषाध्यक्ष का भी प्रावधान था। स्टाफ सलाहकार की नियुक्ति संरक्षक द्वारा शिक्षकों में से की जानी थी, जबकि कोषाध्यक्ष की नियुक्ति भी संरक्षक करता था।
संविधान के तहत संघ में चार निर्वाचित पदाधिकारी- अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और सहायक सचिव- होते थे। इनका चुनाव डूसू के सदस्यों द्वारा साधारण बहुमत के आधार पर सीधे किया जाना था।
अध्यक्ष को छात्र संघ का मुख्य कार्यकारी प्रमुख बनाया गया था, जबकि उनकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष को उनके कार्यों का निर्वहन करना था।
वर्ष 1973 के दस्तावेज में कहा गया था कि डूसू का सचिव अध्यक्ष से परामर्श कर छात्र संघ से जुड़े सभी मामलों में संविधान के अनुरूप काम करेगा।
हालांकि, छात्र संघ की सर्वोच्च सत्ता केंद्रीय परिषद में निहित थी। इसमें संबद्ध कॉलेजों के छात्र संघों के अध्यक्ष, सदस्य संस्थानों से सीधे निर्वाचित प्रतिनिधि, छात्र संघ के पदाधिकारी, स्टाफ सलाहकार, कोषाध्यक्ष और निवर्तमान अध्यक्ष शामिल होते थे।
संविधान में एक कार्यकारी समिति का भी प्रावधान था, जिसमें चार पदाधिकारियों के अलावा केंद्रीय परिषद द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुने गए 11 सदस्य शामिल होते थे। इनमें कम से कम दो महिलाओं का होना आवश्यक था।
केंद्रीय परिषद और कार्यकारी समिति को पदाधिकारियों के कामकाज की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी। इस तरह डूसू की व्यवस्था में सीधे छात्र प्रतिनिधित्व के साथ संस्थागत नियंत्रण और जवाबदेही का भी प्रावधान किया गया था।
छह अगस्त, 1947 को रखे गए उस शुरुआती प्रस्ताव के करीब आठ दशक बाद आज डूसू देश के सबसे प्रमुख छात्र प्रतिनिधि निकायों में शामिल है। इसके चुनावों पर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक नजर रहती है तथा इसके माध्यम से चुने गए कई छात्र नेता आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं।
भाषा रवि कांत रवि कांत नरेश
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