नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि भविष्य की भारतीय न्यायपालिका भव्य इमारतों तक सीमित या भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं रह सकती।
यहां ‘‘न्याय की पुनर्कल्पना: 50 वर्ष बाद भारतीय न्यायपालिका’’ विषय पर आयोजित चौथे अशोक देसाई स्मृति व्याख्यान में प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भविष्य की न्यायपालिका को एक ऐसी सेवा में रूपांतरित होना चाहिए जो सुलभ, उत्तरदायी और नागरिकों के दैनिक जीवन में सहज रूप से एकीकृत हो।
उन्होंने कहा, ‘‘भविष्य की भारतीय न्यायपालिका भव्य इमारतों तक सीमित या भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं रह सकती। इसे एक ऐसी सेवा में रूपांतरित होना होगा जो सुलभ, उत्तरदायी और नागरिकों के दैनिक जीवन में सहज रूप से एकीकृत हो।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका का प्रयास एक ऐसी न्याय प्रणाली विकसित करना होना चाहिए, जो 50 वर्षों बाद अधिक सुलभ, उत्तरदायी और नागरिकों के जीवन से गहराई से जुड़ी हो।
उन्होंने कहा कि भविष्य के न्यायाधीश की पहचान केवल एक कानूनी विशेषज्ञ या न्यायविद तक सीमित नहीं रह सकती।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘अदालतों के समक्ष आने वाले विवादों के लिए कानूनों और पूर्व उदाहरणों से कहीं अधिक व्यापक समझ की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए, न्यायाधीशों को कृत्रिम जीव विज्ञान से संबंधित प्रश्नों से जूझना पड़ सकता है, जिससे जीवन के निर्माण से जुड़े मामलों में जवाबदेही के मुद्दे उठेंगे।’’
भाषा सुभाष दिलीप
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