(अलिंद चौहान)
अलवर, 28 जून (भाषा) अलवर (राजस्थान) के सरिस्का और मध्य प्रदेश के पन्ना जैसे बाघ अभयारण्य में जहां बाघों को फिर से बसाने और उनकी आबादी बढ़ाने के कार्यक्रम बहुत सफल रहे हैं वहीं ओडिशा के सतकोसिया और उत्तराखंड के राजाजी में अभी तक ऐसे नतीजे नहीं मिले हैं। एक नयी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है।
सरिस्का में 2008 में शुरू की गई पुनर्वास पहल से बाघों की संख्या शून्य से बढ़कर अब 56 हो गई है।
हालांकि, सतकोसिया में जहां 2018 में दो बाघों को फिर से बसाया गया था, वहां अभी बाघों की संख्या शून्य है। इस पहल के शुरू होने से पहले ही उस जगह पर एक बाघ मौजूद था।
राजाजी (पश्चिमी हिस्से) में, जहां 2020 में पांच बाघ लाए गए थे, वहां बाघों की संख्या अब भी उतनी ही है। वहां दोबारा बाघ लाए जाने से पहले कोई बाघ नहीं था।
ये नतीजे ‘भारत में बाघों के संरक्षण और पुनर्वास’ से जुड़ी रिपोर्ट के हैं। यह उन तीन रिपोर्टों में से एक है जिन्हें पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को यहां जारी किया।
यह रिपोर्ट 12 अलग-अलग जगहों पर योजनाबद्ध तरीके से बाघों को दोबारा बसाने और उनकी संख्या बढ़ाने के कार्यक्रमों के जरिए बाघों की आबादी को बहाल करने के भारत के अनुभव को दर्ज करती है।
रिपोर्ट जारी करने के मौके पर प्रोजेक्ट टाइगर के अतिरिक्त वन महानिदेशक (एडीजीएफ) संजय कुमार ने कहा, “सतकोसिया में (चीतों को दोबारा बसाने का) देश का पहला अंतर-राज्यीय कार्यक्रम हुआ, जिसके तहत मध्य प्रदेश से ओडिशा में बाघ लाए गए थे।”
हालांकि, हमें उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि हम इस पहल को लेकर स्थानीय समुदायों का भरोसा नहीं जीत पाए।
कुमार ने बताया कि राजाजी में, जहां पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच संपर्कता की कमी है, 2020 में बाघों को दोबारा बसाए जाने के बाद से उनकी आबादी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।
भाषा प्रशांत नरेश
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