बारिश के बाद दिल्ली में पेड़ गिरने की घटनाओं ने शहरी विकास से हुए नुकसान को उजागर किया: विशेषज्ञ
बारिश के बाद दिल्ली में पेड़ गिरने की घटनाओं ने शहरी विकास से हुए नुकसान को उजागर किया: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली, नौ जुलाई (भाषा) पर्यावरण विशेषज्ञों ने बृहस्पतिवार को कहा कि दिल्ली में रातभर हुई तेज बारिश के कारण कम से कम पांच पेड़ गिरने की घटनाओं ने फिर से यह उजागर किया है कि शहर में जरूरत से ज्यादा कंक्रीट का इस्तेमाल करने, खराब शहरी नियोजन और वैज्ञानिक तरीके के बिना निर्माण कार्य करने से पुराने पेड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
रातभर हुई भारी बारिश के बाद राष्ट्रीय राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में कम से कम पांच पेड़ उखड़ गए। इससे यातायात बाधित हुआ और रंजीत नगर में एक खड़ी कार को भी नुकसान पहुंचा। इसमें किसी के घायल होने की कोई सूचना नहीं है।
इन घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता भावरीन कंधारी ने कहा कि बारिश के दौरान पेड़ अचानक कमजोर नहीं हो जाते, बल्कि वर्षों तक मानवीय गतिविधियों के कारण धीरे-धीरे कमजोर होते जाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘बारिश होने पर पेड़ अचानक ‘खतरनाक’ नहीं हो जाते। इन्हें खतरनाक बना दिया जाता है। अधिकारी खुद ही सबसे ज्यादा उल्लंघन करते हैं।’’
कंधारी ने आरोप लगाया कि सड़क चौड़ीकरण परियोजनाएं, पेड़ों के तनों के आसपास पक्की सतह बना देना, नालों के विस्तार का काम, कंक्रीट का अत्यधिक इस्तेमाल-ये सभी कारक धीरे-धीरे उन जड़ों को कमजोर कर देते हैं, जो पेड़ों को जमीन में मजबूती से टिकाए रखते हैं।
उन्होंने कहा कि शहर सौंदर्यीकरण परियोजनाओं पर भारी खर्च करते हैं, जबकि पहले से मौजूद पेड़ों की सुरक्षा की अनदेखी करते हैं। उन्होंने कहा कि ये पेड़ छाया प्रदान करते हैं, शहरी गर्मी को कम करते हैं, बाढ़ के पानी को सोखते हैं और वायु गुणवत्ता में सुधार करते हैं।
कंधारी ने कहा, ‘‘एक हरित शहरी वन क्षेत्र केवल पौधे लगाने से नहीं बनता। इसकी शुरुआत पहले से मौजूद पेड़ों की रक्षा करने, उनकी जड़ों वाले क्षेत्र को सुरक्षित रखने, पर्याप्त मिट्टी की जगह सुनिश्चित करने और हर बुनियादी ढांचा परियोजना में वैज्ञानिक वृक्ष प्रबंधन को शामिल करने से होती है।’’
नयी दिल्ली नेचर सोसाइटी के अध्यक्ष वेरहेन खन्ना ने पेड़ों के गिरने की बढ़ती घटनाओं के लिए शहरी विकास से जुड़े कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया।
खन्ना ने कहा, ‘‘जब पेड़ के तने के आसपास कंक्रीट बिछाने के कारण उसके फैलने के लिए जगह नहीं बचती, तो पेड़ पर दबाव आ जाता है, कमजोर हो जाता है और उसके गिरने की आशंका बढ़ जाती है।’’
उन्होंने कहा कि निर्माण गतिविधियां अक्सर पेड़ों की जड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा, ‘‘लगातार मानव हस्तक्षेप इन समस्याओं का कारण बन रहा है। जंगलों में, कमजोर पेड़ों को भी आसपास का पारिस्थितिकी तंत्र सहारा देता है।’’
इस बीच, दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख राधे श्याम शर्मा ने कहा कि पेड़ों का गिरना अचानक नहीं होता बल्कि यह धीरे-धीरे कमजोर होता है।
शर्मा ने कहा, ‘‘जैसे-जैसे पेड़ बढ़ते हैं, इनकी आवश्यकताएं भी बढ़ती जाती हैं। हर पेड़ की प्रजाति की अपनी अलग जड़ संरचना होती है, लेकिन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना बनाते समय शायद ही कभी यह आकलन किया जाता है कि इनका आसपास के पेड़ों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।’’
उन्होंने कहा कि पौधारोपण अभियान शुरू करने से पहले पुराने पेड़ों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हाल की ये घटनाएं उस समय हुईं जब भारी बारिश के कारण राष्ट्रीय राजधानी के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर जलभराव हुआ और यातायात व्यवस्था बाधित हो गई।
भाषा
देवेंद्र पवनेश
पवनेश

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